वित्त वर्ष 2023 के केंद्रीय बजट में उवर्रक सब्सिडी में करीब 25 फीसदी की कमी की गई है जिससे तीन तरह की संभावनाएं उभरती हैं।
पहली संभावना यह है कि केंद्र को उम्मीद है कि अगले वर्ष अंतरराष्ट्रीय कीमतें उतनी ऊंची नहीं रहेंगी जितनी कि इस साल रहीं जिससे आगामी महीनों में भार में अपने आप कमी आ जाएगी।
दूसरी संभावना है कि खुदरा कीमतों में इजाफा किया जा सकता है।
तीसरा तथा सबसे संभावित परिदृश्य यह है कि कीमतों को कम रखने के लिए केंद्र उर्वरक सब्सिडी में धन वर्ष के मध्य में डालता है। पिछले दो वित्त वर्ष से वैश्विक दरों में इजाफा होने पर केंद्र साल के बीच में उर्वरक सब्सिडी की रकम साल के बीच में बढ़ा रहा है। वित्त वर्ष 2022 में केंद्र सरकार ने उर्वरक सब्सिडी के लिए करीब 79,530 करोड़ रुपये आवंटित किए थे लेकिन साल का अंत होते होते उसने उर्वरक सब्सिडी को संशोधित 1.40 लाख करोड़ रुपये कर दिया। इस प्रकार इसमें 76.1 फीसदी का इजाफा किया गया था। सभी संभावनाओं पर व्यापार और बाजार के सूत्रों ने कहा कि दूसरे और तीसरे परिदृश्य की संभावना अधिक है।
सामान्यतया किसी सामान्य वर्ष में केंद्र को यूरिया और गैर-यूरिया उर्वरकों के लिए करीब 80,000 करोड़ रुपये आवंटित करने की जरूरत पड़ती है।
वित्त वर्ष 2023 में भले ही संशोधित अनुमान से कम लेकिन बजटीय आवंटन फिर भी काल्पनिक जरूरत से 31.5 फीसदी अधिक है।
लेकिन क्या यह पूरे वर्ष की जरूरत को पूरा करने के लिए पर्याप्त है यह एक बड़ा प्रश्न है।
बाजार के सूत्रों का कहना है कि सभी उर्वरकों की मौजूदा बाजार कीमत और भविष्य के कीमत परिदृश्य को देखते हुए वित्त वर्ष 2023 में उर्वरकों के लिए बजट आवंटन अगले 6 से 7 महीनों में ही खर्च हो जाना चाहिए।
उसके बाद यदि बाजार की मौजूदा परिस्थितियां बनी रहती हैं तो नए सिरे से आवंटन की आवश्यकता पड़ सकती है।
उद्योग के एक बड़े अधिकारी ने कहा, ‘वैश्विक उर्वरक बाजार गतिशील बना हुआ है और बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि वित्त वर्ष 2023 में कच्चा तेल, गैस और पेट्रोलियम कीमतों में किस प्रकार का बदलाव होता है और साथ ही भूराजनीतिक तनाव क्या मोड़ लेते हैं। यदि मौजूदा बाजार कीमतें बनी रहती है तो आमराय यह है कि बजट में आवंटित 1.05 लाख करोड़ रुपये की सब्सिडी की रकम घरेलू खपत के मौजूदा स्तर पर 6 से 7 महीनों में समाप्त हो जानी चाहिए।’
कीमत वृद्घि
विभिन्न एजेंसियों से जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि चालू वित्त वर्ष में 28 जनवरी, 2022 तक अंतरराष्ट्रीय बाजारों में यूरिया की कीमत 357 डॉलर प्रति टन से बढ़कर करीब 869 डॉलर प्रति टन हो गया।
जनवरी के पहले हफ्ते से कीमतों में थोड़ी नरमी आई है। इससे पहले नवंबर 2021 में 959 डॉलर प्रति टन हो गया था।
आयातित डाइअमोनिया फॉस्फेट (डीएपी) के मामले में वैश्विक कीमतें अप्रैल 2021 के 400 डॉलर प्रति टन से बढ़कर जनवरी 2022 में 930 डॉलर प्रति टन हो गया। इस प्रकार इसमें 132.5 फीसदी की बढ़ोतरी हुई।
भारत में उर्वरकों में सबसे अधिक खपत यूरिया की होती है जिसके बाद डीएपी का स्थान है।
डीएपी के मामले में सालाना खपत का लगभग आधा स्थानीय तौर पर उत्पादित किया जाता है जबकि शेष का आयात करना पड़ता है।
देश में सालाना यूरिया की खपत करीब 3.3 करोड़ टन है जिसके 70 फीसदी का स्थानीय स्तर पर उत्पादन होता है और शेष का आयात किया जाता है। डीएपी को तैयार करने के लिए जरूरी अमोनिया और फॉस्फोरिक अम्ल का पूरा हिस्सा आयात करना पड़ता है क्योंकि भारत में इसका उत्पादन नहीं किया जाता है।
चालू वित्त वर्ष में वैश्विक बाजारों में अमोनिया की कीमत 430 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 22 जनवरी, 2022 को 900 डॉलर प्रति टन पर था। जबकि इसी दौरान फॉस्फोरिक अम्ल की कीमत 795 डॉलर प्रति टन से बढ़कर 1,330 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई।