केरोसिन के इस्तेमाल में कमी लेकिन कीमतों में इजाफा

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 8:37 PM IST

गरीब आदमी का ईंधन कहे जाने वाले मिट्टी तेल या केरोसिन के भाव बड़े शहरों में दोगुने से अधिक बढ़ चुके हैं जबकि इसके इस्तेमाल में कमी आ रही है।
केरोसिन के भाव कोलकाता और मुंबई में अप्रैल 2020 के मुकाबले इस साल फरवरी में 104 से 112 फीसदी तक बढ़ गए। देश में अप्रैल 2020 के आसपास ही कोविड-19 महामारी की शुरुआत भी हुई थी। चेन्नई में इस दौरान कीमत में 10.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। ऐतिहासिक रूप से चेन्नई ने ईंधन के लिए अधिक सरकारी सब्सिडी दी है।
कुछ वर्ष पहले के मुकाबले कीमत वृद्घि और भी अधिक है।
कीमत वृद्घि का असर पहले जितना नहीं रहा क्योंकि अधिकांश आबादी ने रसोई गैस (एलपीजी) जैसे अपेक्षाकृत स्वच्छ ईंधन का विकल्प चुन लिया है। सरकार के अस्थायी आंकड़ों के मुताबिक सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से दी जा रही केरोसिन की घरेलू खपत 2014-15 के 69 लाख टन से घटकर 2020-21 में 16 लाख टन रह गई।        
इसके अलावा, केरोसिन के उत्पादन और खपत में लगातार अंतर बना हुआ है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केरोसिन की समग्र खपत में घरेलू खपत की हिस्सेदारी 90 फीसदी है। केरोसिन की समग्र खपत में औद्योगिक और अन्य इस्तेमाल को भी शामिल किया जाता है।
अप्रैल 2021 और इस साल जनवरी के बीच केरोसिन की कुल खपत 13 लाख टन थी जबकि उत्पादन 16 लाख टन था। हाल के वर्षों में उत्पादन में कमी आ रही है। खपत में भी उल्लेखनीय स्तर की कमी आई है।
इसका मतलब यह नहीं है कि केरोसिन का इस्तेमाल पूरी तरह से समाप्त हो चुका है हालांकि, सब्सिडी के जरिये बजट सहायता में कमी आई है।
2019 और 2021 के बीच समाज के कुछ वर्गों में केरोसिन का इस्तेमाल बढ़ा है जिसका खुलासा झारखंड में ऊर्जा के इस्तेमाल पर इनिशिएटिव फॉर सस्टेनेबल एनर्जी पॉलिसी (आईएसईपी) अध्ययन में हुआ है। यह अध्ययन झारखंड रूरल एनर्जी ऐक्सेस: एंड्युरिंग चैलेंजेज इन क्वालिटी, अफोर्डेबिलिटी ऐंड बिलिंग शीर्षक से जनवरी में प्रकाशित हुआ था।
विश्व बैंक की सलाहकार दीक्षा बिजलानी, यूनिवर्सिटी ऑफ पिट्सबर्ग में एसोसिएट प्रोफेसर माइकेल एक्लिन, यूनिवर्सिटी ऑफ मयामी में सहायक प्रोफेसर ब्रायन ब्लैंकनशिप, आईएसईपी के कार्यक्रम प्रबंधक वागीश नंदन और जॉन्स हॉपकिंस स्कूल ऑफ एडवांस्ड इंटरनैशनल स्टडीज में प्रोफेसर जोहांस उर्पेलेनेन द्वारा लिख अध्ययन में कहा गया है, ‘आदिवासी परिवारों में प्रकाश के लिए केरोसिन पर निर्भरता 11 फीसदी से बढ़कर 21 फीसदी हो गई है और ग्रिड पहुंच के साथ विद्युतीकृत आदिवासी परिवारों में प्रकाश के प्राथमिक स्रोत के तौर पर ग्रिड का इस्तेमाल 87 फीसदी से कम होकर 74 फीसदी हो गई जबकि बिजली की पहुंच हासिल करने वाले समग्र आदिवासी परिवारों की संख्या में इजाफा हुआ है।’  
बिजली के इस्तेमाल में गिरावट के लिए जिम्मेदार विभिन्न कारणों में से एक बिजली आपूर्ति की खराब हालत बताई जा रही है।
रसोई गैस के इस्तेमाल में कमी के लिए इसके दाम को भी अहम कारण माना गया है।
इस अध्ययन में कहा गया है, ‘असंतोष के लिए कीमत अभी भी एक प्रमुख कारण है जिसके बाद गैस भरवाने के लिए तय की जाने वाली दूरी की बात आती है। रसोई गैस लेने में रुचि के बावजूद परिवारों में लगातार इसके इस्तेमाल में बड़ी बाधाओं में कनेक्शन लेने की लागत और एलपीजी भरवाने पर आने वाला मासिक खर्च शामिल हैं।’
कई राज्य पहले ही खुद को केरोसिन के इस्तेमाल से मुक्त घोषित कर चुके हैं।
सरकार की भारतीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस सांख्यिकी 2020-21 रिपोर्ट में कहा गया है, ‘2020-21 के दौरान आंध्र प्रदेश, अंडमान और निकोबार, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली, दमन और दीव, दिल्ली, हरियाणा, लद्दाख, पुदुच्चेरी और पंजाब केरोसिन मुक्त हैं।’

First Published : March 22, 2022 | 11:20 PM IST