हाल के दिनों में जिंसों के दामों में हालांकि नरमी आई है, लेकिन हो सकता है कि उपभोक्ताओं को जल्द ही इसका लाभ उठाने का मौका न मिले, क्योंकि खाद्य कंपनियों का कहना है कि वे इस लाभ को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने से पहले इनपुट के दामों में और गिरावट का इंतजार कर रहे हैं।
वैश्विक महामारी के पिछले दो वर्षों की वजह से जिंसों की कीमतों में लगातार तेजी का व्यापक प्रभाव पड़ा है, जिससे खाद्य कंपनियों के पास स्नैक्स से लेकर बिस्कुट और कॉफी तक के उत्पादों के दामों में कई बार बढ़ोतरी करने और उनका वजन कम करने का विकल्प चुनने के अलावा कोई चारा नहीं बचा।
कंपनियों ने जहां एक तरफ छोटे पैक के वजन में कमी करने का सहारा लिया, तो दूसरी तरफ बड़े पैक के दामों में सीधी बढ़ोतरी की। हालांकि उन्होंने भले ही इनपुट की इस मूल्य वृद्धि को चरणबद्ध रूप में उपभोक्ताओं पर डाल दिया, लेकिन उनके मार्जिन पर दबाव बना रहा।
बात केवल यही नहीं है। अधिक दामों से मांग पर असर पड़ा है, जिससे उद्योग की बिक्री में नरमी आई है। नमकीन और वेफर्स विनिर्माता बालाजी वेफर्स ने पांच रुपये वाले अपने पैक का वजन दो ग्राम तक तथा 10 रुपये वाले पैक का वजन पांच ग्राम तक कम किया है। इसके संस्थापक चंदू विरानी ने कहा, ‘हम वजन नहीं बढ़ाएंगे, न ही दामों में कमी करेंगे। हमने पिछले दो साल में मुश्किल से कोई मुनाफा कमाया है।’ उन्होंने यह भी कहा कि कंपनी को जिंसों के दामों में कमी, खास तौर पर खाद्य तेल का फायदा 10 से 15 दिनों के बाद ही मिलेगा।
लोकप्रिय बिस्किट ब्रांड पारले-जी बेचने वाली पारले प्रोडक्ट्स भी अपने बिस्कुट के दामों में कमी नहीं करेगी। इसके बजाय यह इस बात का इंतजार करेगी कि जिंसों के दाम कैसे रहते हैं। पहले से बढ़ रहे दामों में भू-राजनीतिक तनावों के कारण बढ़ोतरी की वजह से पिछले छह महीनों में इसके मार्जिन पर 250 से 300 आधार अंकों का प्रभाव पड़ा है। पारले प्रोडक्ट्स के श्रेणी प्रमुख मयंक शाह ने कहा कि अब भी काफी अनिश्चितता चल रही है और हम दामों में आगे कोई और मूल्य निर्धारण संबंधी फैसला लेने से पहले इंतजार करेंगे। उन्होंने कहा कि फर्म ने पहले जो दाम वृद्धि की योजना बनाई थी, उसे फिलहाल रोक रखा है।
शाह ने कहा कि अलबत्ता अगर कीमतें (इनपुट की) मौजूदा स्तरों से 20 प्रतिशत तक और कम हो जाती हैं, तो हम पेशकश और प्रोत्साहन देने पर विचार करेंगे।
कंपनी ने पिछले साल उत्पादों के दामों में बढ़ोतरी का सहारा लिया था, क्योंकि जिंसों के दाम लगातार बढ़ रहे थे। अपने शीर्ष स्तर के बाद से सीपीओ (कच्चा पाम तेल) कांडला की कीमतों में 31.2 प्रतिशत की गिरावट आई चुकी है, गेहूं (दिल्ली) के दाम चार प्रतिशत तक कम होकर प्रति क्विंटल 2,321 रुपये हो गए हैं, जो पहले प्रति क्विंटल 2,411 रुपये के शीर्ष स्तर पर थे और एम-ग्रेड कोल्हापुर चीनी की कीमतों में भी 5.5 प्रतिशत की गिरावट आई है। फिर भी दाम सालाना आधार पर तीन से लेकर 29 प्रतिशत तक ज्यादा हैं।
ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज ने भी वित्त वर्ष 22 के दौरान दामों में 10 प्रतिशत का इजाफा किया है। कंपनी ने अपनी अधिकांश स्टॉक कीपिंग इकाइयों (एसकेयू) में दाम वृद्धि करने के लिए अप्रत्यक्ष तरीके से वजन में कमी की है। पिछले कुछेक महीनों में बढ़ती महंगाई का असर भी मांग पर पड़ा है।
मैरिको ने अपनी आय से पहले जून 2022 तिमाही की सूचना (5 जुलाई को) में कहा है कि भारत में इस क्षेत्र में नरम मांग नजर आ रही है, क्योंकि बढ़ती खुदरा महंगाई से एफएमसीजी कंपनियों के मामले में जेब पर दबाव बढ़ा है। कंपनी ने यह भी कहा कि उपभोक्ताओं ने आवश्यक श्रेणी वाले छोटे पैक की ओर रुख किया है। कंपनी ने कहा कि खाद्य तेलों में बहुत बढि़या खंड से बड़े पैमाने वाले खंड की ओर गिरावट आने के कारण उसके ब्रांड सफोला ऑयल का प्रदर्शन अप्रैल-जून तिमाही में प्रभावित हुआ है।