सितंबर में महंगाई दर घटने से मिली राहत, लेकिन बन रहा है दबाव

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 11:42 PM IST

सितंबर में खुदरा महंगाई दर 5 महीने के निचले स्तर 4.35 प्रतिशत पर रही है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से लेकर नोमुरा जैसी प्रतिष्ठित एजेंसियां और कंपनियां महंगाई के दबाव को लेकर चिंता जता रही हैं। सितंबर में थोक महंगाई दर (डब्ल्यूपीआई) उस स्तर पर पहुंच गई है, जितनी अप्रैल में थी, लेकिन अभी भी यह 10.7 प्रतिशत के उच्च स्तर पर बनी हुई है। ज्यादा दरें आंशिक रूप से सितंबर 2020 के 1.3 प्रतिशत के निम्न आधार के कारण है।
खुदरा खाद्य महंगाई दर सितंबर महीने में गिरकर महज 0.68 प्रतिशत रह गई है, जो इसके पहले महीने में 3.28 प्रतिशत थी। इसमें भी सब्जियों के दाम में गिरावट जारी है और इसमें अगस्त के 11.69 प्रतिशत की तुलना में 22.47 प्रतिशत की गिरावट आई है।
बहरहाल टमाटर व प्याज जैसे खाद्य पदार्थों की कीमत में हाल के सप्ताहों में तेजी आई है। आंकड़ों से पता चलता है कि 6 नवंबर को टमाटर की कीमत इसके पहले के साल की तुलना में करीब 24 प्रतिशत ज्यादा थी।
टमाटर
प्रमुख उत्पादक राज्यों में देर से हुई बारिश के कारण टमाटर की तैयार फसल खराब हो गई, जिसके कारण इसके दाम में तेज बढ़ोतरी हुई है। आधिकारिक अनुमान के मुताबिक अक्टूबर के आखिर में इस खरीफ सत्र में 2,47,000 हेक्टेयर में टमाटर की फसल थी। इसमें से बारिश की वजह से 4,000 हेक्टेयर फसल खराब हो गई। पिछले साल खरीफ सत्र में करीब 2,50,000 हेक्टेयर में टमाटर की खेती हुई थी।  अगले कुछ सप्ताह तक खुदरा बाजार में टमाटर के भाव 30 से 80 रुपये किलो रहने की संभावना है। नई फसल की आवक के साथ दाम में कुछ कमी आ सकती है।
प्याज
खरीफ की फसल बारिश से खराब होने से अक्टूबर में इसके दाम तेजी से बढ़े हैं। केंद्र सरकार के भंडार में रखे प्याज बाजार में उतारने से कीमतों में कुछ कमी आई और 6 नवंबर को पिछले साल की समान अवधि की तुलना में खुदरा बाजार में प्याज के दाम करीब 38 प्रतिशत कम रहे।
एक आधिकारिक अनुमान के मुताबिक इस साल खरीफ सत्र में करीब 3,85,000 हेक्टेयर प्याज की बुआई हुई है। इसमें से करीब 59,000 हेक्टेयर फसल पर हाल की बारिश का असर पड़ा है। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के कुछ सप्ताह पहले के आकलन से पता चलता है कि प्याज की कीमत खुदरा बाजार में 30 से 60 रुपये किलो रहने की संभावना है।
खाद्य तेल
पिछले कुछ महीनों के दौरान सभी प्रमुख खाद्य तेलों के दाम आसमान पर रहे हैं। खासकर फरवरी, 2021 के बाद वैैिश्वक कीमतों में तेजी (जहां तिहलन की फसल का एक हिस्सा जैव ईंधन में बदला गया) और घरेलू भंडार कम रहने का असर पड़ा है। फरवरी से अब तक कीमतें कम करने के लिए केंद्र ने 5 बार आयात शुल्क कम किया है। हाल में 13 अक्टूबर को पाम, सोयाबीन और सूरजमुखी तेल के कच्ची किस्म पर बुनियादी सीमा शुल्क खत्म कर दिया गया है और साथ ही मार्च, 2022 तक के लिए कृषि उपकर भी खत्म कर दिया गया है।
इसके बावजूद उपभोक्ता मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 6 नवंबर को मूंगफली तेल की कीमत पिछले साल की तुलना में 18.44 प्रतिशत, सरसों तेल 43 प्रतिशत, वनस्पति 45 प्रतिशत, सोयाबीन तेल 45 प्रतिशत, सूरजमुखी तेल 37 प्रतिशत और आरबीडी पामोलीन 37 प्रतिश महंगा है। पिछले महीने की तुलना में कीमत कुछ कम हुई है।
दलहन
जब खाद्य तेल के दाम बढ़ रहे थे, उसी समय दलहन की कीमतें भी बढऩी शुरू हुईं। कीमतों पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार ने कई कदम उठाए  और पहले आयात आसान किया और उसके बाद स्टॉक सीमा लगाई गई। इन कदमों का कुछ असर नजर आता है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक पिछले साल की तुलना में 6 नवंबर को अरहर और मूंग दाल की कीमत 1.32 और 2.37 प्रतिशत कम थी। लेकिन उड़द और मसूर की कीमत 0.33 और 21 प्रतिशत ज्यादा है। चना दाल पिछले साल से  4.21 प्रतिशत महंगी है। कम आयात की वजह से मसूर की कीमत तेजी से बढ़ी है।
ईंधन के दाम
पिछले कुछ महीने से ईंधन के दाम बढ़ रहे हैं। बहरहाल केंद्र सरकर द्वारा पेट्रोल व डीजल पर उत्पाद शुल्क में 5 रुपये व 10 रुपये लीटर की कटौती किए जाने से खुदरा मूल्य महंगाई दर 0.30 प्रतिशत कम होने की संभावना है। इसके अलावा 23 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों ने भी मूल्यवर्धित कर में कमी की है, जिससे महंगाई आगे और कम होगी।  बहरहाल कच्चे तेल की वैश्विक कीमत इसमें मुख्य भूमिका निभाएगी।
अक्टूबर महीने में कच्चे तेल का भारतीय बास्केट बढ़कर 82.11 डॉलर प्रति बैरल हो गया, जो इसके पहले महीने में 73.3 डॉलर प्रति बैरल था। यह वित्त वर्ष 22 के पहले महीने में 63.40 डॉलर प्रति बैरल था।
बार्कलेज में भारत के मुख्य अर्थशास्त्री राहुल बाजोरिया ने कहा, ‘खराब होने वाले खाद्य पदार्थों की कीमत में उतार-चढ़ाव असामान्य नहीं है। इस पर बेमौसम बारिश के झटकों का भी असर हुआ है, जिसकी वजह से प्रमुख सब्जियों की कीमत बढ़ी है। हमारा मानना है कि इससे महंगाई दर पर मामूली असर होगा। भारत की राह में मुख्य व्यवधान आयातित वस्तुओं के मूल्य खासकर ऊर्जा उत्पादों के मूल्य में तेजी के झटके हैं।’
हाल में खाद्य वस्तुओं की महंगाई का ही मसला नहीं है बल्कि प्रमुख महंगाई भी बढ़ रही है। प्रमुख महंगाई में खाद्य और ईंधन के अतिरिक्त सामान की महंगाई शामिल होती है। इक्रा में मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने कहा, ‘मांग बहाल हो रही है, ऐसे में उत्पादक जिंसों की बढ़ी और ढुलाई का खर्च बढऩे का बोझ खरीदारों पर डाल रहे हैं। इसके कारण प्रमुख खुदरा महंगाई असहज करने वाले स्तर पर बनी रहने की संभावना है।’

First Published : November 8, 2021 | 12:04 AM IST