केंद्र से कपास आयात में राहत मांग रहा कपड़ा क्षेत्र

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 8:00 PM IST

सूती वस्त्र और धागा निर्माताओं द्वारा आगामी महीनों में कच्चे माल की आपूर्ति में किए जाने वाली कमी के मद्देनजर कंपनियों ने सरकार से फिर कच्चे कपास की शुल्क मुक्त आयात की अनुमति देने की मांग की है।
व्यापार सूत्रों ने व्यापारियों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बड़ी मात्रा में जमाखोरी की संभावना को नकारते हुए कहा कि 31 मार्च, 2022 को करीब 30 लाख गांठें स्टॉक में बची थीं जबकि सामान्य स्टॉक 50 से 60 लाख गांठों का होता है। 1 गांठ 170 किलोग्राम का होता है। किसानों के पास अलग से 50 लाख गांठें थीं। इस प्रकार पाइपलाइन स्टॉक करीब 80 लाख गांठों का है जो तीन से चार महीने के लिए पर्याप्त है।    
उद्योग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘नई फसल अक्टूबर के आस पास ही आएगी। इसका मतलब है कि मिलों और तकलियों को चलाने के लिए हमें शीघ्र ही शून्य शूल्क पर कच्चे कपास की कम से कम 40 लाख बेलें आयात करने की जरूरत है।’
कपास की खड़ी फसल को नुकसान होने से उत्पादन शुरुआती अनुमान से कम हुआ जिसके कारण स्थिति बदतर हो गई है।
कच्ची कपास पर शुल्क 10-11 फीसदी लगता है।
कपास की कीमतें कुछ महीनों में प्रति कैंडी 70,000 रुपये से बढ़कर 90,000 रुपये से ऊपर पहुंच गई। एक कैंडी 356 किलोग्राम के बराबर होता है। कीमत वृद्घि ऐसे समय पर हो रही है जब पूरे कपड़ा मूल्य शृंखला में ऑर्डरों के कारण घरेलू बाजार में मांग बढ़ गई।     
अहमदाबाद स्थित कपड़ा समूह चिरिपाल ग्रुप की कंपनी नंदन टेरी के मुख्य कार्याधिकारी रौनक चिरिपाल ने कहा, ‘कई वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ है मिलों को चलाने के लिए पर्याप्त कपास नहीं है। काफी सारे मिलों को कपास की किल्लत हो सकती है और अक्टूबर में कपास की फसल आने से पहले के तीन से चार महीने मिलों को बंद रखना पड़ सकता है। इसके अलावा देश में कपास की कीमतें बढऩे से वह अमेरिकी कपास के मुकाबले 5 से 10 फीसदी तक महंगी हो गई है। लिहाजा, कपास पर आयात शुल्क को समाप्त करना लाजिमी हो गया है।’
इसी तरह से सदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन (एसआईएमए) ने अन्य कपड़ा उद्योग संगठनों के साथ मिलकर कपड़ा और वस्त्र उद्योग को हो रही गुणवत्तापूर्ण कपास की किल्लत पर चिंता जताई है।

First Published : April 11, 2022 | 11:00 PM IST