अनिल हवा की ताकत से कमाएंगे दौलत

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:08 PM IST

तमाम कारोबारों में हाथ आजमा रहे अनिल अंबानी को अब पवन ऊर्जा की बयार लुभाने लगी है।


देश में वैकल्पिक ऊर्जा की बढ़ती मांग को भांपकर रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह अपनी नई कंपनी ग्लोबल विंड एनर्जी जीडब्ल्यूई के जरिये इस मैदान में भी उतरने जा रहा है। नई कंपनी पवन चक्की में लगने वाले पुर्जों का निर्माण करेगी। इनमें टरबाइन, टावर और ब्लेड भी शामिल होंगे।

सूत्रों ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि कंपनी ने इसके लिए 1,000 करोड़ रुपये का निवेश करने की योजना बनाई है। इस रकम से सिलवासा से 22 किलोमीटर दूर खेरड़ी में नया कारखाना तैयार किया जाएगा। खेरड़ी में कंपनी ने 50 एकड़ जमीन का अधिग्रहण पहले ही कर लिया है।

कंपनी ने संयंत्र लगाने के लिए काम तेज भी कर दिया है और अगले दो-तीन महीनों में यहां से व्यावसायिक स्तर पर उत्पादन भी शुरू कर दिया जाएगा। समूह की कंपनी रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर पहले ही बिजली बनाने में इस्तेमाल होने वाले कलपुर्जे बनाने का फैसला कर चुकी है। कंपनी ने इसके लिए शांघाई इंजीनियरिंग के साथ साझा उपक्रम बनाया है, जिसके तहत विनिर्माण संयंत्र लगाया जाना है।

इस योजना के लिए ग्लोबल विंड एनर्जी ने दुनिया भर की पवन ऊर्जा कंपनियों के साथ करार किया है और ये कंपनियां उसे तकनीकी सहयोग मुहैया कराएंगी। परियोजना का पहला चरण मौजूदा कैलेंडर वर्ष में ही पूरा हो जाएगा और उसके तहत 750 किलोवाट की टरबाइन बनाई जाएंगी।

उद्योग के सूत्रों ने बताया कि इस संयंत्र की कुल उत्पादन क्षमता लगभग 750 मेगावाट प्रतिवर्ष होगी। बाद में इस संयंत्र में 2 मेगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता वाली टरबाइन भी बनने लगेंगी। इस बारे में पूछे जाने पर रिलायंस अनिल धीरूभाई अंबानी समूह के अधिकारियों ने कोई भी टिप्पणी करने से इनकार कर दिया।

अलबत्ता उद्योग सूत्रों ने जरूर बताया, ‘जीडब्ल्यूई के मौजूदा संयंत्र और विनिर्माण योजना पर नजर डालें, तो सुजलॉन के बाद यह भारत की दूसरी सबसे बड़ी पवन ऊर्जा कंपनी हो सकती है।’ सूत्रों ने यह भी बताया कि जीडब्ल्यूई का जोर घरेलू क्षेत्र की कंपनियों पर ज्यादा हो सकता है।

सुजलॉन का ध्यान अंतरराष्ट्रीय कंपनियों पर ज्यादा है। इस वजह से भारत में पवन ऊर्जा का बाजार अनछुआ ही पड़ा है, जिसे अनिल अंबानी भुना सकते हैं। जीडब्ल्यूई की सिलवासा इकाई में पहले चरण में 750 किलोवाट की टरबाइन बनाई जाएंगी। इस परियोजना के लिए कंपनी ने डेनमार्क की कंपनी नॉर्विन के साथ हाथ मिलाया है।

अगले दो चरणों में डेढ़ मेगावाट क्षमता वाली विंड टरबाइन बनाई जाएंगी। इसके लिए जर्मनी की कंपनी फरलैंडर एजी के साथ करार हुआ है। इसी तरह दो मेगावाट क्षमता वाली टरबाइन के निर्माण के लिए नीदरलैंड की लगार्वे के साथ समझौता किया गया है।

First Published : September 1, 2008 | 2:33 AM IST