बांग्ला फिल्मोद्योग का होगा कायाकल्प

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:06 PM IST

बांग्ला फिल्मोद्योग कायाकल्प के लिए तैयार है। शेमारू एंटरटेनमेंट, रिलायंस बिग एंटरटेनमेंट, सारेगामा फिल्म्स और नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने इस उद्योग में पैसा लगाने के लिए कमर कस ली है। 


कंपनियां अगले दो वर्षों में बांग्ला फिल्मों पर 150 करोड़ रुपये का निवेश करने की तैयारी में हैं जिसमें पोस्ट प्रोडक्शन, मार्केटिंग  और फिल्म के गानों की मोबाइल डाउनलोडिंग आदि प्रमुख रूप से शामिल है।

रिलायंस एंटरटेनमेंट और फन मल्टीप्लेक्स जैसी कंपनियों ने कोलकाता के कुछ जीर्ण-शीर्ण थिएटरों को नया रूप देकर उन्हें आधुनिक एवं भव्य मल्टीप्लेक्सों में तब्दील करने की योजना है। बांग्ला फिल्मोद्योग अनुमानित रूप से 40 करोड़ रुपये का है।

भारत में हर साल कुल 800 फिल्में रिलीज होती हैं जिनमें से कम से कम 43 बांग्ला फिल्में होती हैं। बांग्ला फिल्म के निर्माण पर 1 से 2 करोड़ रुपये तक का खर्च आता है। बांग्ला फिल्मों के निर्देशकों और ईस्टर्न इंडिया मोशन पिक्चर एसोसिएशन (ईआईएमपीए) जैसे संगठनों का कहना है कि बांग्ला फिल्मोद्योग को पुनर्जीवित किया जा सकता है।

इस उद्योग में अभी भी भरपूर गुणवत्ता मौजूद है और बांग्ला फिल्में देखने वाले लोगों की तादाद भी काफी अधिक है। ‘अबार अराण्ये’ और ‘यात्रा’ फिल्मों के निर्देशक गौतम घोष ने बताया, ‘इन दिनों लोग बांग्ला फिल्में देखने से परहेज कर रहे हैं। इसके लिए दो कारण प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। पहला कारण यह है कि प्रिंट्स की क्वालिटी बेहद लचर है। दूसरा कारण यह है कि फिलहाल पश्चिम बंगाल में ऐसा एक भी मूवी थिएटर नहीं है जिसकी हालत ठीक-ठाक हो और लोग आराम से फिल्म देख सकें।’

भारत में खस्ता हालत वाले कम से कम 78 मूवी थिएटर पिछले साल बंद हो चुके हैं जिनमें से 50 कोलकाता में थे। रिलायंस एंटरटेनमेंट जैसी कंपनियों ने दक्षिण भारतीय फिल्म बाजार जैसे अन्य क्षेत्रों की तरह बांग्ला फिल्म उद्योग के कायाकल्प की योजना बनाई है।

रिलायंस एंटरटेनमेंट पश्चिम बंगाल में मल्टीप्लेक्सों की स्थापना की योजना बना रही है। इसके अलावा यह कंपनी राज्य में जर्जर हालत वाले कुछ मल्टीप्लेक्सों को खरीद कर इनकी दशा सुधारने की भी योजना बना रही है। फन मल्टीप्लेक्स भी राज्य में पुराने और जर्जर हालत वाले कुछ थिएटरों को खरीद कर इन्हें नए ब्रांड ‘टॉकी टाउन’ के तहत नया रूप देने की तैयारी कर रही है। फिलहाल देश में कंपनी के 10 टॉकी टाउन हैं। ये टॉकी टाउन पुराने और जर्जर हालत वाले थिएटरों के उन्नत नमूना हैं।

फन मल्टीप्लेक्स प्राइवेट लिमिटेड के सीओओ विशाल कपूर ने बताया, ‘हम कोलकाता में अधिग्रहण और रीब्रांडिंग के लिए परिसंपत्तियों की तलाश कर रहे हैं। हम इन परिसंपत्तियों को टॉकी टाउन में तब्दील करना चाहते हैं। लेकिन शहर में अधिकांश परिसंपत्तियां बेहद छोटी हैं। हमारे छोटे से छोटे टॉकी टाउन का आकार 200 सीटों का है वहीं बड़े आकार वाले टॉकी टाउन 1200 सीटों से लैस हैं। इसलिए हम दुर्गापुर, हावड़ा, आसनसोल, जैसे इलाकों में टॉकी टाउन ब्रांड के निर्माण की संभावना तलाश रहे हैं।’

रिलायंस एंटरटेनमेंट भी बड़े बजट वाली फिल्मों के निर्माण के लिए प्रसेनजीत, रितुपर्णो घोष जैसे कई जाने-माने बांग्ला अभिनेताओं, निदेशकों और कलाकारों से बातचीत कर रही है। बिग म्यूजिक ऐंड होम एंटरटेनमेंट के मुख्य कार्यकारी कुलमीत मक्कर ने कहा, ‘बांग्ला फिल्में बड़ी तादाद में प्रशंसकों को आकर्षित करने में विफल रही है। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि इनके निर्माण और प्रमोशन में सीमित निवेश के कारण ये गुणवत्ता से दूर हो चुकी हैं।

अधिकतम खर्च वाली बांग्ला फिल्म 3 करोड़ रुपये में बन जाती है वहीं तमिल जैसी अन्य क्षेत्रीय फिल्म के निर्माण पर 40 करोड़ रुपये की लागत आती है।’ शेमारू फिल्म्स भी बांग्ला फिल्मों के कायाकल्प के लिए आगे आई है। डिजिटल क्वालिटी से तैयार किए जाने वाले मूवी प्रिंट के  संदर्भ में कंपनी ने अपने श्रोताओं को आराम से फिल्में देखने के लिए श्रेष्ठ क्वालिटी मुहैया कराने की पेशकश की है।

शेमारू एंटरटेनमेंट की सहायक उपाध्यक्ष (मार्केटिंग) रोशनी सेन के मुताबिक क्षेत्रीय भाषा की फिल्मों में विकास की अपार संभावनाएं मौजूद हैं, बशर्ते इन्हें ठीक तरह से अंजाम दिया जाए। फिल्मों के निर्देशन में सुधार के अलावा इनकी डिजिटल क्वालिटी पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है ताकि स्क्रीन पर फिल्म को अच्छी तरह से देखा जा सके। 

शेमारू फिल्म्स ने आइनोक्स मूवीज के साथ करार किया है। इस करार का मकसद न सिर्फ फिल्मों को देखने में यानी व्यूइंग क्वालिटी में सुधार लाना है बल्कि वह राष्ट्रीय स्तर पर फिल्मों को प्रमोट भी करेगी। शेमारू की बांग्ला फिल्में सबटाइटल्स के साथ तैयार की जाएंगी ताकि अन्य क्षेत्रों में भी लोग इन्हें समझ सकें।

इसी तरह नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनएफडीसी) जाने-माने निर्देशकों की तलाश के लिए कोलकाता में फिल्म संस्थानों के साथ बातचीत कर रही है ताकि वह बांग्ला फिल्मों का निर्माण कर सके। एनएफडीसी देश में सिनेमा को बढ़ावा देने वाली एक नोडल संस्था है।

First Published : August 31, 2008 | 11:02 PM IST