इलेक्ट्रॉनिक कचरे से मुंह मोड़ रहे हैं वैश्विक ब्रांड

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 3:45 PM IST

एचसीएल और विप्रो जैसी दो दिग्गज भारतीय कंपनियां जहां अपने कंप्यूटरों और इलेक्ट्रॉनिक सामान पुराने हो जाने पर उन्हें वापस लेने और रिसाइक्लिंग यानी कचरे से नया सामान तैयार करने जैसी सेवाओं की पेशकश कर रही हैं।


वहीं ज्यादातर वैश्विक ब्रांड देश में इलेक्ट्रॉनिक-कचरे यानी ई- कचरे के गंभीर खतरे को टालने के लिए गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं। यह तथ्य ग्रीनपीस के एक अध्ययन से उभर कर सामने आया है। पर्यावरण समूह ग्रीनपीस ने पूरे भारत में 20 कंपनियों पर यह अध्ययन कराया है।

‘टेक-बैक ब्लूज: एन एसेसमेंट ऑफ ई-वेस्ट टेक-बैक इन इंडिया’ नामक इस अध्ययन में भारतीय कंपनियों की इलेक्ट्रॉनिक कचरे को लेकर उनकी जिम्मेदारी की भावना की प्रशंसा की गई है और कहा गया है कि किसी भी अंतर्राष्ट्रीय ब्रांड ने देश में इस समस्या को लेकर गंभीरता नहीं दिखाई है।

अध्ययन के मुताबिक, ‘एचसीएल और विप्रो जैसे भारतीय ब्रांड अपनी इच्छा से अपने ग्राहकों से पुराने सामान को वापस लेकर इसके बदले उन्हें नए उत्पाद मुहैया करा रहे हैं।’ अध्ययन के मुख्य शोधकर्ता अभिषेक प्रताप ने बताया कि अध्ययन से सामने आए तथ्यों से वे हैरत में हैं।

उनके मुताबिक, ‘ऐसा लगता है कि भारत में ई-कचरा वापस लिया जाना और उसे सही तरीके से ठिकाने लगाना वैश्विक ब्रांडों की प्राथमिकता नहीं है, नहीं तो भला कोई कैसे सोनी, सोनी एरिक्सन, तोशिबा, सैमसंग और फिलिप्स जैसे ब्रांडों को गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के लिए जिम्मेदार ठहरा सकता है।’ खास बात यह है कि ये कंपनियां अन्य कई देशों में पुराने सामान को वापस लेने की सुविधा मुहैया कराती हैं।

प्रताप कहते हैं, ‘दूसरी तरफ नोकिया, एलजी इलेक्ट्रॉनिक्स और मोटोरोला जैसे बड़े ब्रांड भारत में ये सेवाएं पूरी तरह से मुहैया कराने में सक्षम नहीं हैं। सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी एचपी समेत अन्य कंप्यूटर निर्माता डेल और लेनोवो ग्रीन-वॉश में सक्रिय हैं, लेकिन पुराने सामान को वापस लेने की इनकी सेवा दिखाई ही नहीं देतीं।’

अध्ययन के मुताबिक एसर और एचसीएल को छोड़ कर भारत में कोई भी इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद से जुड़ा ब्रांड ई-कचरा कानून के समर्थन के मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है। पूरे देश में रोजाना तकरीबन 1,040 टन जहरीला कचरा फेंका जाता है, जिसमें खराब कंप्यूटर, टेलीविजन, रेडियो-ट्रांजिस्टर सेट और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण शामिल हैं।

केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के मुताबिक अनुमान हैकि ई-कचरा हर साल 15 फीसदी की दर से बढ़ रहा ह। मंत्रालय के अनुमान के अनुसार 2012 तक इलेक्ट्रॉनिक-कचरा 8 लाख टन हो जाएगा। प्रताप ने कहा, ‘ग्रीनपीस ने संभावना जताई है कि इन उत्पादों से जुड़ी जिम्मेदार कंपनियां वैश्विक रूप से अपने सभी ग्राहकों को पुराना सामान वापस लेने की पेशकश कर उन्हें नए सामान मुहैया कराएंगी।’

फिलहाल इलेक्ट्रॉनिक-कचरे के महज 3 फीसदी की ही सही तरीके से रिसाइक्लिंग की जाती है बाकी कचरे की रिसाइक्लिंग यानी कचरे से नया सामान तैयार करने की प्रक्रिया अनौपचारिक तरीके से की जाती है जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरा बढ़ रहा है। कबाड़ीवाला यानी कबाड़ चुनने वाले लोग इलेक्ट्रॉनिक सामान और अन्य धातुओं को जलाते हैं, जिससे जहरीली गैसें निकलती हैं।

केंद्र सरकार ने हाल ही में ई-कचरे के निपटान के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे, जिनमें इलेक्ट्रॉनिक कचरे को खतरनाक करार दिया गया था और एक्सटेंडेड प्रोडयूसर रेस्पोंसिबिलिटी (ईपीआर) सुनिश्चित करने के लिए एक कानून बनाए जाने का वादा किया गया था।

First Published : August 7, 2008 | 11:31 PM IST