आजाद भारत के पहले तेल कुंए ने अपनी उम्र के पचास पड़ाव पार कर लिए हैं।
लुनेज 1 नाम का यह कुआं एशिया की अव्वल नंबर की तेल और गैस उत्खनन तथा उत्पादन कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ओएनजीसी) के मुकुट का सबसे चमकदार नगीना है। लुनेज 1 भारत में आजादी के बाद खोजा गया पहला कुआं ही नहीं है और न ही इसकी अहमियत 50 साल पूरे करने की वजह से है।
दरअसल गुजरात को तेल का भंडार देने में भी इसका बड़ा योगदान है। इस कुएं की वजह से ही पता चला कि गुजरात में खंबात की खाड़ी में तेल का प्रचुर भंडार है।
दिलचस्प है कहानी
इस कुएं की खोज भी दिलचस्प तरीके से हुई थी। 5 सितंबर 1958 को सुबह 9 बजे का वक्त था। ओएनजीसी के एक भू वैज्ञानिक ने गीली मिट्टी में हल्के भूरे रंग का धब्बा देखा। लेकिन उसे पता नहीं था कि इस धब्बे की कीमत क्या है क्योंकि जिंदगी में कभी उसने कच्चा तेल नहीं देखा था।
उसने तकरीबन 5 किलोमीटर दूर स्थित आधार शिविर से रूसियों को बुलाया। उन्होंने आते ही कहा, ‘हां, यह तेल है। हमने तेल खोज लिया है।’ इसे लुनेज 1 का नाम दिया गया। दिलचस्प है कि रूसियों का भारत में तेल कुआं खोदने का यह पहला काम था और पहली बार में ही उन्हें तेल मिल गया।
तार में देर बनी नेमत
इस तलाश के पीछे एक और दिलचस्प कहानी है। डाक विभाग की लेटलतीफी ही इस कुएं की तलाश का कारण बन गई। डाक विभाग अगर लापरवाही नहीं बरतता, तो ऐसा नहीं होता। अगर एक तार वक्त से पहुंच गया होता, तो लुनेज 1 के बारे में किसी को पता नहीं चलता।
दरअसल, कुछ दिनों की खुदाई के बाद यह मान लिया गया कि खंबात खाडी में रेत ही नहीं है। इसलिए देहरादून में ओएनजीसी के मुख्यालय में यह काम बंद करने का फैसला कर लिया गया। इस बारे में तार भी भेज दिया गया, लेकिन वह देर से पहुंचा, इसलिए खुदाई का काम जारी रहा।
यह वाकया आईआरएस के पूर्व निदेशक लक्ष्मण सिंह ने सुनाया, जो उस वक्त खंबात की खाड़ी में बतौर भू वैज्ञानिक काम कर रहे थे। ओएनजीसी के दस्तावेज में भी यह वाकया दर्ज है। इसमें लुनेज 1 की तलाश और उसके बाद का सारा ब्यौरा दिया गया है।
आलोचकों के मुंह बंद
लुनेज 1 की तलाश के साथ ही ओएनजीसी ने कई आलोचकों के मुंह भी हमेशा के लिए बंद कर दिए। दरअसल ओएनजीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक चंद लोगों के अलावा कमोबेश सभी लोग कांबे में खुदाई का विरोध कर रहे थे। उनका मानना था कि इस बेसिन में तेल कभी बन ही नहीं सकता।
खाकी वर्दी पहने सिंह मिट्टी के नमूने लेने के लिए बाल्टी लेकर जब उस जगह पहुंचे, तो उन्हें पता ही नहीं था कि तेल किस तेजी के साथ निकल रहा है। नतीजा यह हुआ कि सिंह और उनकी पूरी वर्दी तेल से सराबोर हो गई। इस बेशकीमती खोज की यादगार के तौर पर बरसों तक उन्होंने वर्दी संभालकर रखी। आजादी से पहले भी भारत में कच्चे तेल की तलाश की गई थी। उस समय असम में तेल मिला था।