माइक्रोलैब्स ने कहा दिशानिर्देश में शामिल थी डोलो

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 4:25 PM IST

लोकप्रिय पैरासिटामोल ब्रांड डोलो बनाने वाली बेंगलूरु की कंपनी माइक्रो लैब्स ने कहा है कि 650 एमजी (मिलीग्राम) पैरासिटामोल दवा कोविड-19 के उपचार के लिए केंद्र सरकार की ओर से जारी राष्ट्रीय उपचार दिशानिर्देश का हिस्सा थी।इस प्रकार यह डॉक्टरों के बीच लोकप्रिय दवा बन गई।

कंपनी ने कहा कि डोलो की कुल सालाना बिक्री 350 से 400 करोड़ रुपये है जिसकी कीमत 2 रुपये प्रति टैबलेट है। माइक्रो लैब्स ने यह भी कहा कि 500 एमजी क्षमता के बजाय 650 एमजी क्षमता वाली दवा को बढ़ावा देने का कोई विशेष कारण नहीं था क्योंकि दोनों मूल्य नियंत्रण के अंतर्गत हैं।
माइक्रो लैब्स के कार्यकारी उपाध्यक्ष जयराज गोविंदराजू ने बिजनेस स्टैंडर्ड से बात करते हुए कहा, ‘हमने कई वर्षों के दौरान अपने सभी 14 प्रभागों के बीच विपणन खर्च के तौर पर 1,000 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, न कि वैश्विक महामारी के दौरान डोलो के विपणन पर।’
कंपनी के अनुसार, इस रकम को 5 साल अथवा उससे अधिक समय में खर्च किया गया और इसमें टेबल-टॉप मेमोरैबिलिया, डायरी, पेन, कैलेंडर और ब्रांड रिमाइंडर जैसे मामूली उपहार शामिल थे।
गोविंदराजू ने आगे कहा कि केंद्र सरकार की ओर से जारी कोविड-19 दिशानिर्देशों में रोगियों को पैरासिटामोल 650 एमजी देने की बात कही गई है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जनवरी 2022 में हल्के एवं बिना लक्षण वाले मामलों के होम आइसोलेशन पर ताजा दिशा-निर्देश जारी किए गए थे। उसमें कहा गया था कि बुखार के नियंत्रित न होने पर मरीजों को दिन में चार बार पैरासिटामोल 650 एमजी दवा दी जाए।
सर्वोच्च न्यायालय में एक सुनवाई के दौरान फेडरेशन ऑफ मेडिकल ऐंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया (एफएमआरएआई) ने आरोप लगाया है कि 500 एमजी पैरासिटामोल का मूल्य नियंत्रित है जबकि उच्च खुराक वाली दवा को मूल्य नियंत्रण से बाहर रखा गया है। कानूनी खबरें देने वाली वेबसाइट लाइवलॉ डॉट इन ने बताया कि एफएमआरएआई के वकील ने सर्वोच्च न्यायालय में दलील दी थी कि अपना लाभ बढ़ाने के लिए माइक्रो लैब्स ने 650 एमजी की खुराक निर्धारित करने के लिए डॉक्टरों के बीच मुफ्त उपहार वितरित किए थे।
गोविंदराजू ने बताया कि डोलो 650 एमजी की कीमत 2 रुपये प्रति टैबलेट है और यह अधिक मार्जिन वाली दवा नहीं है। उन्होंने कहा कि वैश्विक महामारी के दौरान यह अधिक मात्रा में बिकने वाली दवा बन गई और बाजार की मांग को पूरा करने के लिए माइक्रो लैब्स को अपनी विनिर्माण क्षमता को तीन गुना तक बढ़ाना पड़ा। उन्होंने कहा, ‘हम अपनी सिक्किम इकाई में डोलो बना रहे थे और अंततः मांग को पूरा करने के लिए हमने पांडिचेरी और बेंगलूरु संयंत्रों में भी इस दवा का उत्पादन शुरू कर दिया था। इसके लिए हमें अन्य दवाओं का उत्पादन छोड़ना पड़ा था।’ वैश्विक महामारी के दौरान डोलो निश्चित तौर पर माइक्रो लैब्स का प्रमुख ब्रांड बन गया था। स्टॉकिस्टों ने कहा कि वैश्विक महामारी के दौरान डोलो-650 की अधिक मांग के कारण कालपोल (जीएसके फार्मा) और क्रॉसिन (जेीएसके कंज्यूमर) जैसे अन्य प्रमुख ब्रांडों को झटका लगा था।
अनुसंधान एवं विश्लेषण फर्म अवाक्स के अध्यक्ष (विपणन) शीतल सापले ने कहा कि वैश्विक महामारी से पहले माइक्रो लैब्स के कुल कारोबार में डोलो का योगदान करीब 7 फीसदी था जो अब बढ़कर करीब 14 फीसदी हो चुका है।

First Published : August 22, 2022 | 10:14 PM IST