दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (डीएमआरसी) भले ही एक सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हो लेकिन मुनाफे के मामले में यह किसी भी निजी क्षेत्र की कंपनी को टक्कर दे सकती है।
डीएमआरसी की वित्त, रियल एस्टेट और विस्तार से जुड़ी परियोजनाओं पर कंपनी के प्रबंध निदेशक ई श्रीधरन से बातचीत की भूपेश भन्डारी और बिजित आर ने। मुख्य अंश:
साल 2006-07 में डीएमआरसी के कुल राजस्व में से लगभग 40 फीसदी मेट्रो के परिचालन से आया था। क्या यह इससे भी ज्यादा हो सकता है?
मेट्रो के परिचालन से आने वाला राजस्व यात्रियों की खर्च करने की क्षमता के हिसाब से ही होना चाहिए। इसीलिए हमने मेट्रो का किराया 6 रुपये से 24 रुपये के बीच ही रखा है। मुझे खुशी होगी अगर हम मेट्रो के परिचालन से होने वाली कमाई को कम कर विज्ञापन, आवंटित जमीन का व्यावसायिक उपयोग और सलाहकार सेवाओं से ज्यादा कमाई कर सकें। इससे यात्रियों को सबसे ज्यादा और असली फायदा होगा।
दुनिया के बाकी महानगरों में मेट्रो के परिचालन से होने वाली आय काफी कम होती है क्योंकि वहां मेट्रो को सरकार सब्सिडी देती है। लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं होता है। इसीलिए हमें अपनी आय दूसरे विकल्पों के जरिए बढ़ानी पड़ रही है।
लेकिन आप पहले ही विज्ञापन, रियल एस्टेट और सलाहकार सेवाओं से कमाई कर रहे हैं। आपको इन सभी तरीकों से अच्छी खासी कमाई भी हुई है। क्या इन सब के अलावा कमाई करने का और भी कोई विकल्प बचा है?
सिंगापुर जैसे महानगरों में मेट्रो के पास रियल एस्टेट और सलाहकार सेवाओं के अलावा बस और ट्राम की सुविधा भी होती है। हालांकि हमारे पास भी फीडर सेवाओं के लिए 100 बसों का बेड़ा है।
लेकिन हमने इस सुविधा को कमाई का जरिया बनाने के बजाय यात्रियों को बेहतर सुविधाएं देने के लिए शुरू किया है। हमने 300 एसी बसों के लिए भी निविदा जारी की है। इससे हमारे उन स्टेशनों को मदद मिलेगी जो किन्हीं कारणों से पर्याप्त राजस्व नहीं कमा पा रहे हैं।
दिल्ली मेट्रो के पहले चरण में मीटर गेज का इस्तेमाल किया गया था। लेकिन दूसरे चरण में आप स्टैन्डर्ड गेज का इस्तेमाल कर रहे हैं। इससे कितनी बचत हुई है?
स्टैन्डर्ड गेज के इस्तेमाल से 4-5 फीसदी की बचत हुई है। इसी तरह की बचत हम मेट्रो के परिचालन और रखरखाव में भी करना चाहते हैं। लेकिन स्टैन्डर्ड गेज के इस्तेमाल का सबसे बड़ा फायदा होगा कि यह वैश्विक स्तर का होगा इससे तकनीकी स्तर पर इसे अपग्रेड करने में आसानी होगी।
2006-07 में डीएमआरसी को रियल एस्टेट से 251.80 करोड़ रुपये की कमाई हुई थी जो कॉर्पोरेशन की परिचालन से होने वाली आय 222.66 करोड़ रुपये से ज्यादा थी। क्या 2007-08 में भी इसी तरह रहेगा?
रियल एस्टेट से होने वाली कमाई 2007-08 में भी ज्यादा ही रहेगी। लेकिन यह ज्यादा दिन तक नहीं चलेगा। दरअसल रियल एस्टेट से कमाई दो तरह की होती है।
अपफ्रन्ट इनकम हमें कॉर्पोरेशन की जमीन के व्यावससयिक उपयोग से मिलती है और दूसरी हर साल प्राप्त होने वाली राजस्व कमाई है। जब हमारे पास भूमि की कमी हो जाएगी तब हमारी अपफ्रन्ट कमाई समाप्त हो जाएगी। इसीलिए रियल एस्टेट से आने वाली कमाई हमेशा इसी तरह नहीं रहने वाली है।
डीएमआरसी के पास फिलहाल कितनी भूमि है?
व्यवसायिक इस्तेमाल के लिए तो हमारे पास अलग से कोई जमीन नहीं है। हम अपनी इंजीनियरिंग तकनीक का इस्तेमाल कर ट्रांसपोर्टेशन और स्टेशनों के लिए आवंटित भूमि में से ही अतिरिक्त जगह बना लेते हैं। यह अतिरिक्त भूमि हमें आवंटित भममि का 4-5 फीसदी से ज्यादा नहीं होगी।
दिल्ली मेट्रो किस दर से विकास कर रही है?
पिछले एक साल में मेट्रो से सफर करने वाले यात्रियों की संख्या में 24 फीसदी की दर से इजाफा हुआ है। अगर हम यात्रियों को और बेहतर सुविधाएं दे पाएं तो यह दर ज्यादा बढ़ सकती है।
कुछ निर्माण परियोजनाओं की लगातार बढ़ती लागत के कारण ठेकेदार काम बंद कर चुके हैं। क्या दिल्ली मेट्रो के साथ भी ऐसा कुछ हुआ है?
हालंकि कई कंपनियों को यह शिकायत है लेकिन हमारे ठेकेदारों ने कभी भी ना तो बीच में काम रोका है और ना ही इसमें देरी की है। हमारे अनुबंधों में कीमत बढ़ाने की बात है लेकिन वह निर्माण में इस्तेमाल होने वाली चीजों के दाम बढ़ने के आधार पर नहीं है।
हम यह बदलाव एक बार इस्पात के लिए कर चुके हैं। इसके तहत इस्पात के दाम में हुई बढ़ोतरी का 80 फीसदी हिस्सा डीएमआरसी वहन करेगी और 20 फीसदी ठेकेदार। इससे सभी ठेकेदार सहमत हैं। लेकिन बाकी सब चीजों के लिए पुराना फॉर्मूला ही लागू है।
डीएमआरसी ने कई परियोजनाएं निर्धारित समय से पहले पूरी की हैं। क्या दूसरे चरण में भी ऐसा होगा?
हम सारा काम तय सीमा से पहले पूरा कर सकते हैं लेकिन इसके लिए लगने वाले कच्चे माल की आपूर्ति नहीं हो पाएगी। जैसे कि नोएडा लाइन के लिए कच्चे माल की आपूर्ति जून 2009 में ही हो पाएगी। इसीलिए हम अपनी परियोजनाओं में देरी कर रहे हैं।
क्या ट्रेन की आपूर्ति में भी समस्या आ रही है?
ट्रेन के लिए निविदा भरने में काफी वक्त लगता है। दरअसल ट्रेन का यात्रियों की सुरक्षा और उनके आराम के हिसाब से बेहतर होना बहुत जरूरी है। ऑर्डर देने के बाद इसके निर्माण में लगभग 20 महीने का वक्त लगता है। निर्माण होने के बाद उसके परीक्षण में भी 3-4 महीनों का समय लगेगा।
क्या इससे परियोजनाओं में देरी भी होगी?
नहीं किसी भी परियोजना में कोई देरी नहीं होगी। ऐसा होने पर हम आपूर्तिकर्ता को सजा देंगे। इसके लिए हमारे नियम बहुत कड़े हैं।
आमतौर पर दिल्ली मेट्रो किसी भी परियोजना को 1-2 किलामीटर के क्षेत्र में बांटकर अलग अलग ठेकेदारों को देती है। छोटे क्षेत्र के लिए ठेकेदारों का मुनाफा भी कम होगा। क्या इससे गुणवत्ता पर कोई फर्क पड़ता है?
मैं ऐसा नहीं मानता कि मुनाफा मार्जिन कम होता है। हम कोई भी ठेका लंबाई के हिसाब से नहीं देते बल्कि पूरे पैकेज को देखकर देते है। आमतौर पर हमारा हर पैकेज 100-200 करोड़ रुपये के बीच होता है।
इस पैकेज में से ठेकेदार 6-8 फीसदी तक बचा लेते हैं। लेकिन हम कच्चे माल की गुणवत्ता पर भी कड़ी नजर रखते हैं। अगर हमें कभी भी लगता है कि इस्तेमाल होने वाले माल की गुणवत्ता अच्छी नहीं है हम उसे पूरा काम फिर से करने के लिए कहते हैं।