निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों के लिए आवासीय परियोजनाएं विकसित करने वाली रियल एस्टेट कंपनियां कर छूट के गलत दावे करने के लिए आयकर विभाग की जांच के दायरे में आ गई हैं।
आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80आईबी (10) के तहत इन परियोजनाओं से होने वाला मुनाफा तभी कर से मुक्त है जब परियोजना का भूमि क्षेत्र कम से कम एक एकड़ हो, 31 मार्च 2007 से पहले स्थानीय अधिकारी की मंजूरी हासिल हो गई हो और चार साल के अंदर इसे पूरा कर लिया गया हो।
पुणे क्षेत्र में पांच मामलों की जांच के दौरान 40 करोड़ रुपये के गलत दावों का पता चला था। कर छूट के लिए ये दावे उस वक्त किए गए थे जब आवासीय परियोजनाओं को चार साल की अवधि के अंदर पूरा नहीं किया गया था। इसके बाद कई और कंपनियों को मानकों का उल्लंघन करने का दोषी पाया गया।
पुणे में गलत दावों के खुलासे के बाद सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्सेज (सीबीडीटी) ने अपने कर्मियों को रियल एस्टेट डेवलपरों की ओर से कर छूट के लिए देश भर में ऐसे गलत दावों का पता लगाने का निर्देश दिया था। आयकर विभाग के अधिकारी इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या इन आवासीय परियोजनाओं के लिए स्थानीय अधिकारियों से मंजूरी और परियोजना को पूरा करने के लिए प्रमाण पत्र प्राप्त किया गया है या नहीं।
आधिकारिक सूत्रों का कहना है कि इस पहल से राष्ट्रीय स्तर पर राजस्व में करोड़ों रुपये का इजाफा होने की उम्मीद है। आय कर विभाग ने कम्प्यूटर आधारित जांच प्रणाली के तहत ऐसे मामलों के चयन के लिए एक मापदंड के तौर पर धारा 80आईबी (10) के तहत अत्यधिक कटौती पर अमल किया है।