सोने के आयात पर लगाम लगाने के उद्देश्य से आयात शुल्क में इजाफा किया गया है। बुनियादी शुल्क को 7.5 फीसदी से बढ़ाकर 12.5 फीसदी कर दिया गया है। साथ ही 3 फीसदी जीएसटी का बोझ भी बरकरार रहेगा। देश के व्यापार घाटे और रुपये पर दबाव को हल्का करने के उद्देश्य से यह वृद्धि की गई है।
सोना आयात सूची की दूसरी सबसे बड़ी वस्तु है और वित्त वर्ष 2022 में उसका योगदान 46 अरब डॉलर रहा जो वित्त वर्ष 2021 के 34.6 अरब डॉलर के मुकाबले कहीं अधिक है। ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल 2021 और फरवरी 2022 के बीच सोने का मात्रात्मक आयात बढ़कर करीब 842 टन हो गया जबकि वित वर्ष 2021 (अप्रैल 2020 से मार्च 2021) में यह आंकड़ा 642 टन रहा था। मात्रा के लिहाज से मई में सोने का आयात 98 टन रहने का अनुमान है जो मई 2021 में आयातित 11.5 टन सोने के मुकाबले करीब 9 गुना अधिक है। अप्रैल में 27 टन सोने का आयात हुआ था। सोने के आयात में अधिकांश हिस्सेदारी ज्वैलर्स की है जिन्होंने वित्त वर्ष 2022 में 39 अरब डॉलर के स्वर्णाभूषण का निर्यात किया। सोने के निर्यात पर भी उत्पाद शुल्क बढ़ा दिए गए हैं। ज्वैलर्स ने वित्त वर्ष 2023 के बजट बुनियादी आयात शुल्क को घटाकर 4 फीसदी किए जाने के लिए असफल लॉबिइंग करने के बाद सरकार से इस पर नए सिरे से विचार करने की अपील की है। उनका कहना है कि सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में अंतर के कारण तस्करी को बढ़ावा मिलता है। अमेरिकी डॉलर में मजबूती के साथ ही सोने की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में गिरावट आई है। इस पहल से आभूषण विक्रेताओं को नुकसान हो सकता है। उन्हें घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों मोर्चों पर मूल्य वृद्धि का बोझ ग्राहकों के कंधों पर सरकाना होगा। इससे घरेलू मांग निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित होगी। तस्करी भी मांग को प्रभावित कर सकती है।
सरकार द्वारा शुल्क वृद्धि की घोषणा किए जाने के तत्काल बाद टाइटन, कल्याण ज्वेलर्स और पीसी ज्वैलर्स के शेयर मूल्य पर कोई खास प्रभाव नहीं दिखा और विश्लेषकों ने इस क्षेत्र के लिए अपनी ‘बाय’ रेटिंग को बरकरार रखी। चौथी तिमाही के दौरान सोने की कीमतों में काफी वृद्धि के बावजूद इस क्षेत्र के शेयर लगभग स्थिर रहे। शादी-ब्याह का सीजन (मई) दमदार रहने की बात कही गई लेकिन जून में टाइटन के शेयर में गिरावट दर्ज की गई। विश्लेषकों ने शुल्क वृद्धि से पहले टाइटन के लिए लक्षित मूल्य को 2,500 से 2,900 रुपये के दायरे में रखा था। इससे मौजूदा मूल्य के मुकाबले तेजी का पता चलता है लेकिन अब लक्षित मूल्य को घटाया जा सकता है।
गोल्ड लोन बाजार में गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) पर शुल्क वृद्धि के प्रभाव का आकलन करना कठिन है। इस प्रकार के ऋण की मांग आमतौर पर उस दौरान बढ़ती है जब घरेलू वित्तीय स्थिति कमजोर हो जाती है और अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं होती है।
पिछले तीन वर्षों के दौरान बेरोजगारी और मुद्रास्फीति में तेजी के कारण गोल्ड लोन की मांग बढ़ी है। हालांकि आर्थिक स्थिति सही न होने पर अदायगी में चूक की आंशका बढ़ जाती है और लेनदारों को गिरवी रखे स्वर्णाभूषण की नीलामी करनी पड़ती है। यदि बहुत अधिक नीलामी करनी पड़ती है तो एनबीएफसी के मार्जिन को झटका लगेगा।