डी सुब्बाराव ने शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक के नए गवर्नर का पदभार संभाल लिया। ऐसा नहीं लगता कि वह इस नई भूमिका में खुद को बहुत असहज महसूस करेंगे।
इससे पहले भी वह मई 2006 से केंद्रीय बैंक के केंद्रीय बोर्ड में गैर-वित्तीय निदेशक के तौर पर अपनी सेवाएं दे चुके हैं। इसके अलावा सुब्बाराव आर्थिक मामलों के सचिव के तौर पर आरबीआई से लगातार संपर्क में रहे हैं।
जब देश बढ़ती महंगाई से परेशान था और इससे निपटने के लिए उपयुक्त मौद्रिक और वित्तीय नीतियों की जरूरत थी, उस समय सचिव के तौर पर सुब्बाराव की आरबीआई के साथ भूमिका को महत्त्वपूर्ण माना जा रहा था। उनके लिए यह बहुत मुश्किल नहीं था क्योंकि वह सिक्के के दोनों पहलुओं से अच्छी तरह वाकिफ थे।
महंगाई को रोकने के लिए कौन कौन से कदम उठाए जाने चाहिए और उनकी क्या सीमाएं हैं, इसे वह अच्छी तरह से समझते थे। सुब्बाराव को नए गवर्नर के पद पर नियुक्त किए जाने से उन लोगों को कोई खास हैरानी नहीं हुई होगी जो नॉर्थ ब्लॉक-मिंट रोड पर बहुत नजदीक से नजर रखते हैं।
आंध्र प्रदेश में जन्मे इन 59 वर्षीय अधिकारी के पास बेहतर शैक्षणिक और प्रशासकीय योग्यताएं हैं। ऐसे समय में जब भारत के केंद्रीय बैंक के हरेक कदम और कामकाज पर नजर रखी जा रही है, इसके गवर्नर के तौर पर सुब्बाराव को नियुक्त किया जाना एक अच्छा फैसला है। सुब्बाराव के करियर प्रोफाइल को देखें तो भी वह इस पद के लिए उपयुक्त लगते हैं।
आंध्रप्रदेश जब आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया से गुजर रहा था उस समय सुब्बाराव राज्य के वित्त सचिव थे, इस वजह से वह जानते हैं कि जब कोई व्यवस्था सुधार के दौर से गुजरती है तो उस समय कौन कौन सी परेशानियां सामने आती हैं और कैसे कैसे राजनीतिक पचड़ों का सामना करना पड़ता है। यहां उनकी थीसिस की चर्चा अगर न की जाए तो शायद बात अधूरी रह जाएगी।
उसका विषय था, ‘राज्य स्तर पर वित्तीय सुधार’, एक ऐसा विषय जिसको लेकर भारत में लंबे समय से बहस होती रही है और आज भी जारी है। महंगाई को रोकने में आरबीआई की भूमिका आने वाले समय में भी महत्त्वपूर्ण बनी रहेगी और इसमें सुब्बाराव का अर्थशास्त्री और नौकरशाह का पिछला अनुभव भी मददगार साबित होगा।