मंदी की मार से परेशान कंपनियों ने अब अपने उत्पादों की बिक्री में तेजी लाने के लिए डायरेक्ट मार्केटिंग का सहारा लिया है।
डायरेक्ट मार्केटिंग को अपनाने के लिए कंपनियां प्रमोशनल गतिविधियों के लिए पहले की तुलना में दोगुना खर्च कर रही हैं। उदाहरण के लिए सबसे पहले जिक्र करते हैं, बेतार इंटरनेट सेवा देने वाली कंपनी टाटा इंडिकॉम का। कंपनी ग्राहकों को रिझाने के लिए पिछले एक साल में डायरेक्ट मार्केटिंग पर अपने खर्चे को डेढ़ गुना कर चुकी है।
कंपनी के उपाध्यक्ष (मार्केटिंग) अब्दुल खान कहते हैं कि डायरेक्ट मार्केटिंग करने पर तुरंत प्रतिक्रियाएं मिलती हैं। खान बताते हैं कि अब वह दिन गए जब कोई कंपनी अपने उत्पादों को बेचने के लिए 60 सेकंड का विज्ञापन देकर निश्चिंत हो जाया करती थी। अगर अब उन्हें बाजार में दूसरी कंपनियों से बाजी मारनी है तो नए और अनोखे तरीके आजमाने होंगे।
हालांकि खान यह भी मानते हैं कि डायरेक्ट मार्केटिंग इतनी आसान भी नहीं है। जहां टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन काफी आकर्षक लगते हैं वहीं डायरेक्ट मार्केटिंग में बिल्कुल भी ग्लैमर नहीं है। ऐसे में कुछ ही एजेंसियां हैं जो डायरेक्ट मार्केटिंग को अच्छी तरह समझ पाती हैं।
रियल एस्टेट, दूरसंचार और कंज्यूमर डयूरेबल्स कंपनियों को भी लगता है कि टीवी और प्रिंट मीडिया में विज्ञापन देने से ज्यादा बेहतर परिणाम डायरेक्ट मार्केटिंग से मिल सकते हैं। डायरेक्ट मार्केटिंग का एक बड़ा फायदा है कि इस पर आपको किन्हीं और विज्ञापन माध्यमों की तुलना में कम खर्च करना पड़ता है और कंपनियां जो खर्च करती हैं उस पर बेहतर रिटर्न मिलने की उम्मीद भी होती है।
बेट्स एशिया की मार्केटिंग सेवा शाखा 141 सरकन के प्रबंध निदेशक विजय सिंह बताते हैं कि सूचना तकनीक और कंज्यूमर डयूरेबल्स कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां ग्राहक के व्यवहारों को समझने के लिए रोबो शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। रोबो का मतलब होता है रिसर्च ऑनलाइन, बाई (खरीद) ऑफलाइन। सिंह बताते हैं कि इन दिनों उपभोक्ताओं में यह चलन बढ़ता जा रहा है।
मुद्रा समूह के लिए मार्केटिंग का जिम्मा उठाने वाली एजेंसी किडस्टफ प्रमोशनल मार्केटिंग के पास पिछले साल की तुलना में 30 से 40 फीसदी क्लाइंट ज्यादा आ रहे हैं। कंपनी के अध्यक्ष जय डी कोस्टा कहते हैं कि चूंकि मार्केटिंग को लेकर कंपनियां ज्यादा जागरुक हो गई हैं इस वजह से अब क्लाइंट इस मोर्चे पर ज्यादा से ज्यादा निवेश करने को तैयार हैं। वह बताते हैं कि अब प्रचार का उद्देश्य बदल गया है। पहले कंपनियों को यह फर्क नहीं पड़ता था कि प्रचार से उन्हें तत्काल कोई बिक्री मिल रही है या नहीं पर अब वे चाहती हैं कि प्रचार के दौरान ही उनकी बिक्री भी हो।
कंज्यूमर डयूरेबल्स कंपनियां जो पिछले साल डायरेक्ट मार्केटिंग पर 10 से 15 फीसदी खर्च करती थीं अब वे इन पर तकरीबन 30 से 40 फीसदी खर्च करती हैं। हालांकि एफएमसीजी कंपनियां पहले की तरह ही अब भी डायरेक्ट मार्केटिंग पर 10 फीसदी ही खर्च कर रही हैं। इसकी वजह है कि प्रमोशनल गतिविधियों के दौरान अगर कुछ उत्पादों की बिक्री हो भी जाती है तो एफएमसीजी कंपनियों को इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ता है। पर अगर रियल इस्टेट की कंपनियां डायरेक्ट मार्केटिंग के दौरान एक भी ग्राहक बनाने में सफल हो जाती हैं तो उनके खर्च की भरपाई हो जाती है।
यही वजह है कि कई रियल एस्टेट कंपनियां किडस्टफ से प्रचार अभियान चलाने के लिए संपर्क कर रही हैं। डी कोस्टा कहते हैं कि पहले रियल इस्टेट के खिलाड़ी डायरेक्ट मार्केटिंग को लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं रहते थे, पर अब उनका रुझान इस ओर बढ़ा है। कोस्टा बताते हैं कि पिछले एक साल में उनकी कंपनी को रियल एस्टेट कंपनियों की ओर से मार्केटिंग अभियान चलाने के लिए 6 ऑर्डर मिले हैं। वहीं 12 शिक्षा संस्थानों ने ऐसे अभियानों के लिए आवेदन किया है।