भारत जी-20 देशों की अध्यक्षता संभालने को तैयार है। ऐसे में ताकतवर बहुराष्ट्रीय समूह में उसका एक प्रमुख एजेंडा विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं में सुधार शामिल होगा, जिससे उन्हें विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की अपेक्षाओं और जरूरतों के अनुकूल बनाया जा सके।
इन बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार लंबे समय से लंबित है। सूत्रों ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया कि भारत की कवायद होगी कि अध्यक्ष के रूप में इसका समाधान निकाल सके। करीब सभी विकासशील देशों का मानना है कि इनमें एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों का प्रतिनिधित्व कम है और यूरोप व उत्तर अमेरिकी देशों का दबदबा है। भारत के एजेंडे का मसौदा तैयार हो रहा है।
इससे जुड़े एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ‘इन संस्थानों में व्यापक विविधता और ज्यादा संतुलित तरीका अपनाने की जरूरत है। ऐसा होने पर ही इस शताब्दी में इनकी उपयोगिता बरकरार रह सकेगी।’नाम सार्वजनिक न किए जाने को इच्छुक अधिकारी ने कहा कि अभी बहस चल रही है कि इन सुधारों में आईएमएफ और विश्व बैंक जैसे संगठनों में मतदान में सुधार को शामिल किया जाए या नहीं।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि जी-20 में बहुपक्षीय सुधार को लेकर चल रहा काम व्यापक है और तमाम मसलों पर विचार किया जा रहा है, जिसका मकसद विकासशील देशों की उभरती क्षमता के मुताबिक बेहतर प्रतिनिधित्व दिया जाना शामिल है। इस विषय पर शुरुआती काम करने में भारत द्वारा ब्रिक्स मंच पर बहुपक्षीय सुधार को लेकर किए गए काम से मदद मिलेगी।
विश्व व्यापार संगठन, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व बैंक और संयुक्त राष्ट्र संघ सहित अन्य बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार को लेकर भारत लंबे समय से जोर देता रहा है। इस बहुपक्षीयता में अंतरराष्ट्रीय कानून, लोकतंत्र, समता एवं न्याय, आपसी सम्मान, विकास का अधिकार और बगैर किसी दोहरे मानक के किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप से बचना शामिल है। एक दूसरे अधिकारी ने कहा, ‘परिणामस्वरूप भारत और अन्य समान विचारधारा वाले देश सुधार चाहते हैं, जिससे वैश्विक निर्णय निर्माण प्रक्रिया में विकासशील देशों की अर्थपूर्ण हिस्सेदारी सुनिश्चित हो सके।’