कोरोना की गिरफ्त से निकलने के बाद इस बार देशभर में रक्षाबंधन का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। महंगाई के बावजूद खरीदारों के उत्साह ने कारोबारियों के चेहरे पर रौनक ला दी। पूरे देश में लगभग 7 हजार करोड़ का राखी का व्यापार हुआ जो पिछले साल की तुलना में दोगुना है। सबसे बड़ी बात इस बार बाजार में चीनी राखियां पूरी तरह नदारद रही क्योंकि कारोबारियों ने चीनी राखी से तौबा कर लिया था।दो साल के बाद एक बार फिर राखी पर बाजार गुलजार हुए। राखियों का कारोबार कोरोना के पहले से भी अधिक हुआ।
कॉन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) के महानगर मुंबई प्रांत के अध्यक्ष शंकर ठक्कर ने बताया कि व्यावहारिक रूप इस वर्ष चीनी राखी की कोई मांग ही नहीं थी और पूरे देश के बाजारों में केवल भारतीय राखी की ही बहुत मांग थी। लोगों के इस बदलते रुख से यह अंदाजा लगाना बेहद आसान है की धीरे धीरे भारत के लोग अपने दैनिक जीवन में चीनी सामानों उपयोग नहीं के बराबर कर रहे हैं । पिछले साल 3,500 से 4,500 करोड़ रुपये की राखियों का कारोबार हुआ था।
इस वर्ष पूरे देश में लगभग 7 हजार करोड़ का राखी का व्यापार हुआ। हालांकि पिछले साल के मुकाबले इस बार राखियां 20-25 फीसदी महंगी थी । कीमतें बढ़ने के बावजूद इस बार करीब 40 फीसदी राखियां अधिक बिकी हैं। कारोबारियों की मानी जाए तो राखियां महंगी होने के बावजूद मुनाफा पिछले सालों की अपेक्षा कम था क्योंकि लागत करीब 30 फीसदी बढ़ी जबकि कीमत 25 फीसदी ही बढ़ी थी । क्योंकि चीनी राखियों की बिक्री व्यापारियों ने की।
कैट के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीसी भरतिया और राष्ट्रीय महामंत्री प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि चीन पर निर्भरता को कम करके भारत को एक आत्मनिर्भर देश बनाना बेहद जरूरी है वह समय चला गया है जब भारतीय लोग चीनी राखी के डिजाइन और लागत प्रभावी होने के कारण उसको खरीदने के लिए उत्सुक रहते थे। समय और मानसिकता के परिवर्तन के साथ लोग अब स्थानीय राखी को ही ज्यादा पसंद कर रहे हैं। दूसरी ओर कैट ने लोगों को विशेष रूप से देश के व्यापारिक समुदाय के बीच विभिन्न प्रकार की वैदिक राखी का उपयोग करने के लि ए प्रोत्साहित किया। वैदिक राखी स्वयं निर्मित राखी है। पूरे देश ने राखी का त्योहार भारतीय राखी के साथ बड़ी धूमधाम से मनाया।
कारोबारियों का कहना है कि चीन से लाइट, म्यूजिक, स्टोन और पर्ल की राखियां आती थीं, लेकिन अब यह सब राखी देश में ही बन रही हैं। तीन साल पहले तक देश में 70 फीसदी चाइनीज राखी बिकती थीं । इस बार व्यापारियों ने चीन से राखी नहीं मंगवायी । देश में कुल कारोबार में 50 से 60 फीसदी हिस्सा बंगाल का है। इसके बाद गुजरात, मुंबई, दिल्ली, राजस्थान में बड़े पैमाने पर राखियां बनती हैं। कारोबारियों का कहना है कि चीन से सीधे राखी का आयात नहीं होती हैं, लेकिन इसे बनाने में लगने वाला सामान जैसे फैंसी पार्ट, पन्नी , फोम, सजावटी सामान, स्टोन आदि वहीं से आते हैं। राखी बनाने में उपयोग होने वाला 1,000 से 1,200 करोड़ रुपये मूल्य का कच्चा माल चीन से आयात किया जाता है। भारतीय कारोबारियों की अब कच्चे माल में भी निर्भरता लाने की योजना तैयार कर रहे हैं।