महत्त्वाकांक्षी 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य हासिल करने और कोयले की मांग व आपूर्ति में अंतर से हर साल आने वाले संकट से बचने के लिए केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने 81 ताप बिजली इकाइयों को चिह्नित किया है, जिन्हें 2026 तक कोयले की जगह अक्षय ऊर्जा क्षमता में तब्दील कर दिया जाएगा।
इसमें सरकारी कंपनी एनटीपीसी की उत्पादन इकाइयां और टाटा पॉवर, अदाणी पावर, सीईएसई, हिंदुस्तान पावर के साथ अन्य निजी मालिकाना वाली इकाइयां शामिल हैं। कोयले से बिजली बनाने वाली जिन इकाइयों की बिजली महंगी है, उन्हें मंत्रालय ने चिह्नित किया है। ऐसी इकाइयों को 40 प्रतिशत क्षमता से चलाया जाएगा और शेष उत्पादन क्षमता की आपूर्ति अक्षय ऊर्जा स्रोत से की जाएगी।
मंत्रालय ने कहा, ‘ऐसा पाया गया है कि केंद्र, राज्यों व निजी क्षेत्र का कुल मिलाकर 5,800 करोड़ यूनिट ताप बिजली का विकल्प अक्षय ऊर्जा को बनाया जा सकता है। इस मकसद के लिए करीब 30,000 मेगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता की जरूरत होगी।’
इस सूची में क्षेत्र के प्रमुख कारोबारियों के नाम शामिल हैं, वहीं नोट में कहा गया है कि यह सांकेतिक है, न कि संपूर्ण। अन्य बिजली संयंत्रों को भी अक्षय ऊर्जा मिलाने की अनुमति दी जा सकती है। मंत्रालय का अनुमान है कि इससे 3.4 करोड़ टन कोयला बचाया जा सकता है और 6.02 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन कम किया जा सकता है।
पिछले महीने बिजली मंत्रालय ने बिजली उत्पादन में लचीलेपन के लिए योजना अधिसूचित की थी। इसके तहत ताप और पनबिजली के साथ सौर और पवन ऊर्जा मिलाई जानी है। इससे परंपरागत बिजली उत्पादकों को अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने की अनुमति मिल गई है और वे औसत दरों पर बिजली की बिक्री कर सकेंगे।
मंत्रालय ने कहा कि यह योजना हाल में सीओपी26 में भारत की प्रतिबद्धता के हिसाब से है, जिसमें देश ने 2030 तक 500 गीगावॉट अक्षय ऊर्जा क्षमता विकसित करने का वादा किया है। साथ ही 2070 तक शुद्ध कार्बन शून्य क्षमता का वादा किया गया है।
भारत ने 2030 तक 1 अरब टन कार्बन उत्सर्जन कम करने की प्रतिबद्धता जताई है। देश ने कोयले के लिए किसी एक्सपायरी तिथि की घोषणा नहीं की है, लेकिन चरणबद्ध तरीके से आने वाले दशक में इसमें कमी लाने की योजना बनाई है।