दोनों क्षेत्रों के दायित्व एक दूसरे से काफी भिन्न है
हर वेतन आयोग के बाद जब सरकारी कर्मचारियों की तनख्वाह में बढ़ोतरी कर दी जाती है तो यह कहा जाता है कि इससे सरकारी-निजी क्षेत्र की खाई पाटने में मदद मिलेगी।
लेकिन हमें यह समझने की आवश्यकता है कि वेतन के आधार पर इन दोनों क्षेत्रों में अंतर तो किया जा सकता है लेकिन सामाजिक दायित्व के आधार पर ये दोनों क्षेत्र पूरी तरह अलग हैं। हर आदमी अपनी सोच, प्राथमिकता, मूल्यों आदि के आधार पर ही किसी क्षेत्र में जाने का निर्णय लेता है।
ऐसे में केवल तनख्वाह ही महत्वपूर्ण नहीं रह जाती। सरकारी नौकरियों में लोगों को जितनी आजादी मिलती है, वह निजी नौकरियों में नहीं मिल सकती है। प्रश्न यह उठता है कि क्या इस छठे वेतन आयोग से सरकारी से निजी क्षेत्रों की ओर शुरू हुई पलायन की प्रवृति पर रोक लग सकेगी?
मेरा मानना है कि इस पहल से निश्चित रूप से इस प्रवृति में थोड़ी कमी देखने मिल सकती है। संस्थानों से निकलने वाले छात्रों की संख्या यहां उपलब्ध नौकरियों के मुकाबले कई गुणा अधिक है और बहुत छोटे से हिस्से को ही सरकारी एवं निजी क्षेत्रों में नौकरियां मिल पाती हैं।
छोटे-बड़े शहरों में निजी शिक्षण संस्थानों के करीब 70 फीसदी छात्र बेरोजगार हैं। इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं कि यह खाई जब तक बनी रहेगी तब तक हिन्दुस्तान की अर्थव्यवस्था, श्रम बाजार की खाई नहीं पट सकेगी। हालांकि सरकार को यह सोचना चाहिए कि क्या इस वेतन आयोग से जनता की तकलीफ और दुखों के प्रति एक संवेदनशील प्रशासक हासिल कर पाएंगे।
कमल नयन काबरा
अर्थशास्त्री
किसी भी वेतन आयोग से नहीं घटेगी दोनों में खाई
निजी और सार्वजनिक तबके के बीच की खाई कभी कम होने वाली नहीं है। बड़ा भारी अंतर है दोनों के बीच में जो कि सदियों में भी दूर नहीं होने वाला है। छठे वेतन आयोग ने भी इस दूरी को कुछ भी कम नहीं किया है।
क्या दिया है छठे वेतन आयोग ने सार्वजनिक क्षेत्र को। आज भी सरकारी नौकरी में मिडिल लेवल के ऑफिसर को जो वेतन मिलता है, वह निजी क्षेत्र के एक सबसे नए एक्जिक्यूटिव से कम है। फिर सार्वजनिक क्षेत्र में सालाना वेतन में बढ़त न के बराबर है।
छठे वेतन आयोग में 3 फीसदी का इंक्रीमेंट है जबकि निजी क्षेत्र में सालाना बढ़त 20 फीसदी से कम नहीं है। साथ ही निजी क्षेत्र में तरक्की के अवसर ज्यादा हैं। सार्वजनिक क्षेत्र में कितने ही अधिकारी और इंजीनियर आप को इसी कुंठा के शिकार मिल जाएंगे कि उन्हें समय पर प्रमोशन नहीं मिला।
रोजगार के अवसर खत्म होते जा रहे हैं और आने वाले सालों में यह और कम होंगे। एक बात और महत्वपूर्ण है वह है अच्छी प्रतिभा का सार्वजनिक क्षेत्र में न आना। अच्छी शिक्षा पाए लोग सरकारी नौकरी में आने से कतराने लगे हैं।
जल्दी ही उच्च शिक्षा प्राप्त लोग सरकारी विभागों में इंजीनियरिंग और डॉक्टरी की नौकरी से बचने लगेंगे। अच्छे वेतन के अभाव में लोगों ने सेना में जाना बंद कर दिया है।
जब हम पर क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा की बात करते हैं तो निजी और सार्वजनिक क्षेत्र में वेतन को ले कर भी होड़ होनी चाहिए और तभी एक आदर्श परिस्थिति बनेगी। अभी तो जो हालात हैं उसमें छठे नहीं सातवें वेतन आयोग के आने तक निजी और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच की दूरी कम होने वाली नहीं है।
शैलेंद्र दुबे
महासचिव, अ. भा. पॉवर इंजीनियर एसोसिएशन, लखनऊ