…और सरकार के लिए दिल्ली भी हो गई दूर

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 6:45 AM IST

जिस प्रेत की छाया से बचने के लिए संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के मुखिया यानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पिछले चार साल से कोशिश कर रहे थे।


वही प्रेत अचानक उनके सिर पर मंडराने लगा है। वह भी चुनाव के साथ-साथ। खुद संप्रग के दोस्त और सरकार चलाने में उनके मददगार वाम दलों को महंगाई के आंकड़े सामने आते ही यह भान हो गया है कि कुर्सी अब दूर की कौड़ी है। इसीलिए मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो ने अपने बयान में खुलेआम कह दिया, ‘मनमोहन सरकार इस हालत के लिए जिम्मेदार है।

वह वैश्विक मुद्रास्फीति का बहाना कर नहीं बच सकती क्योंकि इस बार इसकी वजह पेट्रो पदार्थों की कीमत बढ़ना है।’ पार्टी महासचिव प्रकाश करात के रुख का अंदाजा तो संवाददाताओं को दिए गए जवाब से ही लग जाता है। उन्होंने मुद्रास्फीति में जबरदस्त इजाफे का कारण पूछे जाने पर पलटकर कहा, ‘जाइए और सरकार से ही पूछिए।’

सोनिया गांधी के ‘बलिदान’ के बाद लंबे राजनीति नाटक के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मनमोहन सिंह बैठे थे। मनमोहन और चिदंबरम जैसे दो ‘बड़े आर्थिक विचारकों’ के बावजूद सरकार कच्चे तेल, महंगाई और लोकलुभावनी राह के बीच संतुलन नहीं बिठा पाई, जिसने देश को मंदी की राह पर धकेल दिया। दिलचस्प बात यह है कि मुद्रास्फीति में इस उफान की सबसे बड़ी वजह पेट्रो पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी का खुद सरकार का कदम है। इससे पहले 6 मई 1995 को यह आंकड़ा 11.11फीसदी था।

अब सरकार के सिर पर चुनावी मैदान में पटखनी खाने का खतरा मंडराने लगा है। उसे आगे भी सख्त कदम उठाने पड़ेंगे, जो जनता को नागवार भी गुजरेंगे। यानी उसके सामने आगे कुआं तो पीछे खाई वाली हालत हो गई है। कड़े कदम नहीं उठाए, तो अर्थव्यवस्था का बंटाधार हो जाएगा और सख्त कदम उठाए, तो सत्ता में वापसी कमोबेश नामुमकिन हो जाएगी। लेकिन मसला तो यही है कि सरकार ने यह हालात खुद ही पैदा कर लिए।

दरअसल मतदाताओं को रिझाने के लिए वह चार साल तक विशेषज्ञों की तमाम चेतावनियों के बावजूद हाथ पर हाथ धरकर बैठी रही। सब्सिडी के बोझ और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बारे में उसे लगातार चेताया जा रहा था, लेकिन सरकार चुप रही। अपने कार्यकाल में उसने तेल की कीमतों में कोई बड़ी बढ़ोतरी नहीं की और एक बार तो कीमत बढ़ाने के फैसले को वापस ही ले लिया। अगर सरकार धीरे-धीरे दाम बढ़ाती रहती, तो उसे एक ही बार में इतनी बड़ी बढ़ोतरी नहीं करनी पड़ती और न ही तेल कंपनियों की सेहत बिगड़ती।
संपादकीय टीम: अश्विनी कुमार श्रीवास्तव, ऋषभ कृष्ण सक्सेना, नीलकमल सुंदरम, कुमार नरोत्तम   

First Published : June 21, 2008 | 12:49 AM IST