तीन साल पहले मोनिका शर्मा और उनकी बहन स्नेहा ने रक्षा बंधन के दिन अपना भाई खो दिया था। वह त्योहार, जो भाइयों और बहनों के बीच के बंधन का उत्सव होता है। उस दिन उनके बड़े भाई, सिविल इंजीनियर दिल्ली के मानव बुद्ध विहार स्थित अपने घर से हरि नगर में अपनी आंटी के घर स्कूटी से जा रहे थे। मोनिका और स्नेहा पीछे सवार थीं।
पतंग उड़ाने का सीजन शुरू हो चुका था, जो स्वतंत्रता दिवस पर चरम पर पहुंच जाता है। किसी कटी पतंग का मांझा मानव के गले में लिपट गया था। यह ऐसा सिंथेटिक मांझा था, जो कांच के लेप वाले मोनोफिलामेंट फिशिंग धागे से निर्मित था। इसका मकसद पतंगबाजी के मुकाबले के दौरान दूसरों को हराने में पतंगबाजों की मदद करना होता है। मांझा इतना तेज था कि मानव की मौके पर ही मौत हो गई। मोनिका कहती हैं ‘रक्षा बंधन अब हमारे लिए मातम का दिन है।’
प्रतिबंध और भरमार
प्रतिबंध के बावजूद सिंथेटिक मांझा लोगों तथा जानवरों को मारते और घायल करते हुए कई लोगों की जिंदगियों में मातम के दिन ला चुका है। हाल ही में तीन बच्चों के 35 वर्षीय पिता विपिन कुमार अपने स्कूटर पर शास्त्री पार्क फ्लाईओवर पार कर रहे थे। तभी किसी कटी पतंग के मांझे के टुकड़े, जिसे पतंग उड़ाने वालों की भाषा में ‘चीनी मांझा’ कहा जाता है, ने उनका गला काट दिया। उनकी मौके पर ही मौत हो गई। पीछे सवार उनकी पत्नी और बेटी के सामने ही यह खौफनाक हादसा हुआ।
यह मांझा इतना मजबूत था कि जब कुमार इससे जूझ रहे थे, इसने उनके हाथों को भी जख्मी कर दिया था। इस साल इस मांझे की वजह से मरने वाले कुमार चौथे शख्स थे।पतंग उद्योग पर प्रतिबंध लगाने के मांग के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दायर करने वाले एसपी सिंह कहते हैं कि हादसों की संख्या सूचित किए गए हादसों की तुलना में अधिक है। एक आरटीआई के जवाब में दिल्ली पुलिस ने कहा कि उसके पास ऐसी घटनाओं का अलग से कोई रिकॉर्ड नहीं है। हालांकि मीडिया की खबरों के मुताबिक अकेले दिल्ली में ही हर साल 100 से ज्यादा ऐसी घटनाएं होती हैं।
सिंह कहते हैं ‘रिपोर्ट तभी दर्ज की जाती है, जब कोई मरता है। घायलों को तो कोई गिनता ही नहीं।’ वर्ष 2006 में उन्होंने सिंथेटिक मांझे से एक उंगली गंवा दी थी। यह हत्यारा मांझा भारत में ही निर्मित है, लेकिन इसे चीनी इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसकी प्रमुख सामग्री – पॉलिप्रोपाइलीन नामक सिंथेटिक पॉलिमर चीन से आता है। काफी सस्ता होने की वजह से भी इसे चीनी कहा जाता है। ढाई रुपये से लेकर साढ़े तीन सौ रुपये में 2,700 मीटर की दर पर यह पारंपरिक सूती मांझा की तुलना में आधे से भी कम पड़ता है, जो टूट भी आसानी से जाता है। लेकिन सस्ता होने के बावजूद सिंथेटिक किस्म अपने विक्रेताओं को ज्यादा लाभ मार्जिन 50 प्रतिशत उपलब्ध कराती है, जबकि सूती मांझा 20 से 25 प्रतिशत ही उपलब्ध कराता है। पतंगबाजों के लिए इसका आकर्षण इसकी मजबूती और तेज धार के लिए होता है। इसकी यही विशेषता मौतों और चोटों का कारण बनती है। राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) ने वर्ष 2017 में नायलॉन या सिंथेटिक मांझा के विनिर्माण, वितरण और बिक्री पर प्रतिबंध लगा था। इसके गैर-जैविक अपघटन गुण और मारक प्रकृति की वजह से एनजीटी में यह मामला गैर-सरकारी संगठनों, पर्यावरणविदों और चीनी मांझे के शिकार लोगों द्वारा दायर कई जनहित याचिकाओं के मद्देनजर आया था। दिल्ली उच्च न्यायालय ने सिंह की जनहित याचिका को खारिज करते हुए एनजीटी का आदेश बरकरार रखा और दिल्ली सरकार को इसका कड़ाई से अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश दिया।
अलबत्ता बिजनेस स्टैंडर्ड को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में और इसके आसपास ऐसे कई स्थान मिले, जहां इसे बिना किसी परेशानी के खरीदा जा सकता है। पहले तो मांझा डीलर चीनी मांझा कही जाने वाली किसी भी किस्म के होने से इनकार करते हैं। लेकिन एक बार जब उन्हें यह सुनिश्चित हो जाता है कि इसे खरीदने की कोशिश करने वाला व्यक्ति पुलिस का मुखबिर नहीं है, तो वे इसे अपनी दुकानों या घरों के अंदर से लाने को हमेशा तैयार रहते हैं।
अपना नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक डीलर ने कहा ‘पुलिस द्वारा बार-बार निरीक्षण किए जाने से थोक और खुदरा विक्रेताओं ने चीनी मांझा अपने घर या अन्य जगहों पर रखना शुरू कर दिया है और ऑर्डर के आधार पर इसे बाहर लाया जाता है।’ दिल्ली पुलिस के आंकड़ों से पता चलता है कि इस साल अवैध रूप से चीनी मांझा बेचने के 141 मामले दर्ज किए गए, 137 लोगों को पकड़ा गया और मांझे की 14,160 चरखियां जब्त की गईं।
पीपुल फॉर द एथिकल ट्रीटमेंट ऑफ एनिमल्स (पेटा) की मदद से चीनी मांझे की दो बोरियां जब्त करने के मामले में अपने उप-निरीक्षक को जांच शुरू करने का निर्देश देते हुए हौज काजी के थाना प्रभारी अभिनेंद्र सिंह ने कहा ‘पिछले एक महीने में हम चीनी मांझे की 1,300 चरखियां जब्त कर चुके हैं।’ थाने में मौजूद पेटा के एक सदस्य ने कहा, ‘चीनी मांझे की वजह से न केवल इंसान, बल्कि हजारों पशु-पक्षी भी मर जाते हैं।’ उत्तर पश्चिम दिल्ली की पुलिस उपायुक्त उषा रंगनानी और उनकी टीम ने हाल ही में मांझे की 11,760 चरखियां जब्त की हैं। रंगनानी ने कहा ‘हमने पाया कि इसकी आपूर्ति गुजरात से की गई थी। हम मांझे की बिक्री पर कड़ी नजर रख रहे हैं।’
पुलिस सूत्रों के अनुसार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और मध्य प्रदेश में चीनी मांझा उत्तर प्रदेश के ‘मांझा शहर’ बरेली से भी आता है।
व्यापारियों के अनुसार देश में पतंग उद्योग 2,000 करोड़ रुपये से अधिक का है और यह 5,00,000 लोगों को आजीविका प्रदान करता है। अकेले गुजरात में ही पतंग निर्माण केंद्र का कारोबार 700 करोड़ से अधिक है और यह 1,50,000 लोगों को रोजगार प्रदान करता है।
मांझा बेचना बंद कर चुके एक पतंग व्यापारी नईम खान कहते हैं कि चीनी मांझे के ज्यादातर खरीदार 10 से 35 उम्र वाले युवा होते हैं। वह कहते हैं ‘90 प्रतिशत खरीदार ऐसे युवा हैं, जो पतंगबाजी के मुकाबले के वास्ते इसे चाहते हैं।’
मोनिका और स्नेहा के मामले का कोई समाधान नहीं निकला है। ऐसा लगता है कि उनके भाई को किसी ने नहीं मारा। मोनिका कहती हैं, ‘पुलिस ने एफआईआर तो दर्ज कर ली है, लेकिन कहा है कि वे किसी पर आरोप नहीं लगा सकते हैं, क्योंकि जब उस धागे से मेरे भाई का गला कटा, तो वह किसी का नहीं था, क्योंकि उस धागे को पहले ही काटा जा चुका था।’