केंद्र सरकार ने कोडीन वाले कफ सिरप (खांसी की दवाओं) और बेतुकी हो चुकी कुछ फिक्स्ड डोज कंबिनेशन (एफडीसी) दवाओं को धीरे धीरे हटाने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं।कुछ कोडीन आधारित कफ सिरप और 19 एफडीसी के भविष्य पर अभी फैसला किया जाना बाकी है, वहीं औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड (डीटीएबी) इस मसले पर चर्चा कर रहा है।
कोडीन पर आधारित कफ सिरप को चरणबद्ध तरीके से हटाने को लेकर उद्योग जगत की राय अलग अलग है, जिनका इस्तेमाल कुछ लोगों द्वारा नशे के लिए किया जाता है। दरअसल हाल में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (एनसीबी) ने उत्तर प्रदेश और मुंबई के बीच दवाओं की तस्करी करने वाले एक समूह को गिरफ्तार किया था। एनसीबी की टीम ने इस गिरोह से कोडीन आधारित कफ सिरप की 13,248 बोतलें बरामद की थीं, जिनका कुल वजन 1,600 किलोग्राम था।
बीडीआर फॉर्मास्यूटिकल्स के टेक्निकल डायरेक्टर अरविंद बडीगर ने कहा, ‘दरअसल कोडीन एंटीटूसिव (खांसी को दबाने वाली दवा) है। यह बलगम को निकालने वाली नहीं है, सामान्यतया इसका इस्तेमाल सूखी खांसी में होता है। इस तरह की खांसी मुख्य रूप से एलर्जी की वजह से होती है, या जो लोग धूल में काम करते हैं, उन्हें इसकी समस्या आती है। साथ ही ग्राहकों के लिए इस समय कई और एंटीटूसीव या बलगम निकालने वाली दवाओं के विकल्प मौजूद हैं। ऐसा नहीं है कि कोडीन आधारित दवाएं बदली नहीं जा सकतीं, निश्चित रूप से वे बदली जा सकती हैं।’
बडिगर का मानना है कि नए आते उपचार के बीच कोडीन आधारित दवाओं का असर कम हो चुका है और उपचार में इनकी जरूरत कम है।
बहरहाल इंडियन ड्रग मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (आईडीएमए) ने सरकार के समक्ष अपनी राय रखते हुए अनुरोध किया है कि कोडीन आधारित कफ सिरप पर कुछ लोगों द्वारा दुरुपयोग का हवाला देकर प्रतिबंध नहीं लगाया जाए। आईडीएमए के सचिव जनरल दारा पटेल ने कहा कि सरकार को कोडीन पर आधारित कफ सिरप की बिक्री रोकने की कार्रवाई इस आधार पर नहीं करना चाहिए कि कथित रूप से इससे नशाखोरी हो रही है। उन्होंने कहा कि कोडीन आधारित कफ फॉर्मुलेशन सुरक्षित माना जाता है। मुंबई के एक विश्लेषक ने कहा कि कोडीन आधारित दवाओं का कारोबार के तौर पर 1000 करोड़ रुपये का है, इसे देखते हुए उद्योग की चिंता की वजह साफ है।
बहरहाल डीटीएबी 19 एफडीसी के भविष्य पर भी चर्चा कर रहा है, जिसमें सर्दी की सामान्य दवाएं, सिरदर्द की दवा (उदाहरण के लिए सेरिडॉन) आदि शामिल हैं। दवा विनिर्माताओं से कहा गया है कि वे इन दवाओं का चौथे चरण के परीक्षण के बाद का अतिरिक्त आंकड़ा तैयार करें।
मार्केटिंग की मंजूरी के बाद चौथे चरण का परीक्षण किया गया है। भारतीय औषधि महानियंत्रक (डीजीसीआई) का मानना है कि इन दवाओं के अतिरिक्त आंकड़ों की जरूरत है, इसलिए दवा कंपनियों को अतिरिक्त सुरक्षा आंकड़े जुटाने को कहा गया है।
बडिगर ने कहा कि एफडीसी का इस्तेमाल खासकर सर्दी और शरीर दर्द के उपचार में किया जाता है, जिसमें निश्चित रूप से कुछ अतार्किक कंबिनेशन है, लेकिन क्षय रोग और मलेरिया के उपचार में एफडीसी बहुत अहम है।
उन्होंने कहा, ‘जांच के दायरे में आए मौजूदा एफडीसी पहली श्रेणी के हैं, जिनका इस्तेमाल खांसी, शरीरदर्द आदि में होता है और इस तरह के एफडीसी निश्चित रूप से हटाए जाने चाहिए, क्योंकि विश्व के अन्य देशों में इन्हें मंजूरी नहीं मिली है। इन्हें केवल भारत में मंजूरी मिली है और उनमें से कुछ निश्चित रूप से अतार्किक कंबिनेशन बन चुके हैं।’
डीटीएबी की सलाह पर 2018 में सरकार ने 343 एफडीसी दवाएं प्रतिबंधित कर दी थीं। उस समय 1.25 लाख करोड़ रुपये के घरेलू बाजार में एफडीसी दवाओं की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत थी।