भारत के दवा नियंत्रक (डीसीजीआई) की पेटेंट दवाओं के कॉपीकैट संस्करण केरोकथाम के लिए पेटेंट कार्यालय से सहयोग लेने की योजना पर पानी फिर सकता है।
ऐसा इसलिए है क्योंकि बौध्दिक संपदा के मामलों का प्रशासनिक नियंत्रण करने वाला वाणिज्य मंत्रालय दवाओं को संस्तुति देने की प्रक्रिया में पेटेंट कार्यालय का हस्तक्षेप नहीं चाहता है।
वाणिज्य मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि पेटेंट की स्वीकृति से दवाओं के मार्केटिग के लिए जरूरी मानकों का निर्धारण नहीं होता। एक अधिकारी ने कहा, ‘पेटेंट कार्यालय की स्वीकृति मिलने के बाद भी दवा की मार्केटिंग और मैन्युफैक्चरिंग के लिए स्वीकृति की जरूरत होगी।’
अधिकारियों का कहना है कि सस्ती दवाओं के कॉपीकैट संस्करण को अनुमति देना बौध्दिक संपदा अधिनियम का उल्लंघन नहीं है। एक अधिकारी ने कहा, ‘दवा नियामक की स्वीकृति का सीधा संबंध दवाओं के सुरक्षित और कारगर होने से है। वह पेटेंट मामलों में कुछ भी नहीं कर सकता है। अगर कोई कंपनी किसी दवा का जेनेरिक संस्करण लाना चाहती है और उसके पेटेंट को सुरक्षित रखना चाहती है तो उसे चुनौती देने के लिए वैधानिक प्रावधान मौजूद है।’
डीसीजीआई ने हाल ही में उद्योग जगत से उनके नए पेटेंट दवाओं का ब्योरा मांगा है। इसका उद्देश्य था कि जब कोई दूसरी कंपनी उस तरह की दवा के उत्पादन और मार्केटिंग के लिए अनुमति लेने आए, तो बाजार में पहले से ही मौजूद दवा से उसका मिलान किया जा सके। यह कदम उस समय उठाया गया था जब घरेलू दवा कंपनी सिप्ला और स्विस मल्टीनेशनल कंपनी रोश के बीच विवाद हुआ।
स्विस कंपनी रोश, सिप्ला को न्यायालय ले गई और उसने आरोप लगाया कि उसने जो दवा कम दाम में बाजार में उतारा है, वह रोश की दवा की नकल है और यह पेटेंट नियमों का उल्लंघन है। डीजीसीआई ऐसे मामलों की रोकथाम चाहता है। वाणिज्य मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, ‘इसमें पेटेंट कार्यालय के हस्तक्षेप की कोई जरूरत नहीं है। किसी भी दवा के पेटेंट की स्थिति की जानकारी जरूरी नहीं है। यह सब कुछ जनता के लिए ऑनलाइन उपलब्ध होता है।’
इंडियन फार्मास्यूटिकल्स एलायंस का कहना है कि दवा नियंत्रक का यह कदम भारतीय उद्योग के लिए नुकसानदेह हो सकता है क्योंकि इससे सस्ती दवाएं बनाने की प्रक्रिया को धक्का लगेगा।