आर्थिक जगत के ‘रतन’…मगर राजनीतिशास्त्र में सिफर

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 7:08 PM IST

‘वादा तो आखिर वादा ही होता है…’ 9 जनवरी 2008 को देसी-विदेशी मीडिया से खचाखच भरे दिल्ली के प्रगति मैदान में कहे गए रतन टाटा के ये ऐतिहासिक शब्द पूरी दुनिया की सुर्खियों में छाए हुए थे।


क्योंकि तकरीबन पांच साल पहले दुनिया की सबसे सस्ती कार का एक असंभव सा लगने वाला अपना एक ख्वाब जब रतन टाटा ने जगजाहिर किया था, तो शायद एक भी शख्स ऐसा नहीं रहा होगा, जिसने उन पर यकीन किया हो। मगर टाटा को खुद पर यकीन था।

लिहाजा अपने ख्वाब को उन्होंने पांच साल की कड़ी जद्दोजहद के बाद लखटकिया नैनो की हकीकत की शक्ल में तब्दील कर दिखाया, तो दुनिया ने दांतों तले उंगली दबा ली। मगर अफसोस कि असंभव ख्वाब को भी हकीकत में बदलने वाले इस कद्दावर शख्स ने नैनो की राह में आने वाली अर्थशास्त्र की हर रुकावट तो देख ली, राजनीतिशास्त्र की पढ़ाई में वह बिल्कुल फिसड्डी साबित हुए।

अगर ऐसा नहीं होता तो शायद अक्टूबर तक नैनो को देश की सड़कों पर दौड़ाने की अपनी योजना को अमलीजामा पहनाने के लिए वह सिंगुर की उस जमीन को अपना कर्मक्षेत्र बनाने की गलती न करते, जिसके चलते बनने से पहले ही न सिर्फ नैनो की रफ्तार पर ब्रेक लग गया है बल्कि उनकी 1500 करोड़ रुपये की तगड़ी रकम भी डूबने की कगार पर आ खड़ी हुई है।

वैसे अगर टाटा अपने सलाहकारों में आर्थिक विद्वानों की जमात के साथ गली-कूचे किसी छुटभैये नेता को भी रख लेते तो राजनीतिशास्त्र का यह अध्याय तो वह उन्हें नैनो की योजना बनाते समय ही दे देता। क्योंकि यह अध्याय कमोबेश वैसा ही है, जो देश के हर बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट को लेकर अमूमन होता ही रहता है।

इसमें कोई स्थानीय नेता होता है, धरने-प्रदर्शन होते हैं, किसानों या मजदूरों के हितचिंतकों की एक बड़ी जमात होती है और संबधित राज्य के नेताओं-दलों के बीच इसको लेकर जोरदार रस्साकसी होती है। इस बार भी ऐसा ही है, जिसमें एक तरफ है जमीन वापसी की ममता हठ, दूसरी तरफ है कभी इन्हीं मुद्दों की पुरोधा समझी जाने वाली माकपा, जो अब उनको मनाने की कवायद में जुटी हुई है तो दूर कोने में तटस्थ भाव से तमाशाई की भूमिका में केंद्र।

ममता हठ करने वालों का दावा है कि वे किसानों के हितैषी हैं और उनकी जमीन वापस दिलवाए बिना वह टस से मस नहीं होंगी। कुछ लोग कह रहे हैं कि अगर उनके ये मंसूबे कामयाब हो गए तो वह अपने इस तीर से अगले चुनावों में राज्य की सत्ता का निशाना भी साध लेंगी। अब राजनीतिशास्त्र का यह गणित उन्हें सत्ता दिलवाए न दिलवाए, मगर इतना तो तय है कि टाटा जरूर इस रस्साकसी से सिंगुर से टा-टा कर देंगे।

इसका वह न सिर्फ इजहार कर चुके हैं बल्कि अपने कर्मचारियों को भी वहां से वह वापस बुला चुके हैं। राज्य सरकार इस बात को बखूबी समझ रही है कि नैनो जैसे असंभव ख्वाब की सरजमीं अगर पश्चिम बंगाल से टाटा अगर हटाने को मजबूर हो गए तो यहां के औद्योगिक विकास और निवेश की गाड़ी पटरी से उतर जाएगी। लिहाजा इस ममता हठ को तोड़ने की माथापच्ची में उसके सभी सूरमा लगे हुए हैं।

और हो भी क्यों न, जबकि ममता दी ने मुद्दा ही ऐसा उठाया है, जिसकी सीधी-सीधी खिलाफत करने का मतलब है, राज्य में अपनी किसान विरोधी छवि पेश करना। और राजनीतिशास्त्र के माहिर हमारे देश के नेता अर्थशास्त्र की कीमत पर ऐसी गलती तो कतई नहीं करेंगे।

बहरहाल, बिजनेस स्टैंडर्ड ने इस बार की व्यापार गोष्ठी में इसी मसले पर देशभर के अपने पाठकों से राय-मशविरा किया। राजनीतिशास्त्र और अर्थशास्त्र की इन दो नावों के बीच अधिकतर पाठकों ने जहां इस बात का समर्थन तो किया कि राज्य से नैनो की परियोजना हटाए जाने की किसी भी कवायद को सरकार हर हाल में रोके, वहीं लोगों ने इस बात पर भी जोर दिया कि  इसके चलते किसानों के साथ भी अन्याय न हो।

जाहिर है, अब जनमत का सम्मान तो हर किसी को लोकतंत्र में करना ही होगा। लिहाजा देखना यह है कि राज्य सरकार अब ऐसा कौन सा रास्ता निकालती है, जिसके बाद न तो नैनो को सिंगुर से टा-टा करना पड़े और न ही ममता हठ का अपमान हो। यही नहीं, तमाम राज्य सरकारों समेत केंद्र सरकार और देश के उद्योगपतियों को भी इस मसले से सबक लेते हुए किसी भी परियोजना के पहले अर्थशास्त्र के साथ-साथ राजनीतिशास्त्र का क-ख-ग भी समझना होगा।

First Published : September 1, 2008 | 2:38 AM IST