जब शिव शंकर मेनन को 12 अन्य विदेश सेवा अधिकारियों के मुकाबले तरजीह देते हुए विदेश सचिव बनाया गया तो उस समय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह हिसाब लगा लिया था कि इसमें कितना जोखिम हो सकता है। इसके बावजूद उन्होंने यह फैसला लिया।
परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह (एनएसजी) ने भारत-अमेरिकी असैनिक परमाणु समझौते को स्वीकृति दे दी है और इस तरह भारत भी कूटनीति के जरिये चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो गया है। परमाणु समझौते की दिशा में इस सफलतापूर्ण कदम से उस विश्वास को बल मिला है जो सिंह ने मेनन को नियुक्त करते वक्त उनमें दिखाया था।
खुद मेनन इस बात को स्वीकार करते हैं कि कई ऐसे मौके आए जब उन्हें लगा कि डील पूरी नहीं हो सकेगी। यहां तक कि डील के 48 घंटे पहले उन्होंने अपनी पत्नी मोहिनी को फोन कर कहा, ‘मैं वापस आ रहा हूं, मुझे नहीं लगता कि कुछ हो सकेगा।’ परमाणु डील पर पल पल में जिस तरह से ड्रामा चल रहा था, उसके बाद भी एनएसजी की ओर से स्वीकृति मिलना किसी चमत्कार से कम नहीं है।
एक नोर्डिक देश के राजदूत ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘कमाल है, भारत ने पूरी दुनिया को बता दिया है कि उस पर विश्वास किया जा सकता है।’ हालांकि एनएसजी से स्वीकृति मिलने का श्रेय मेनन अकेले नहीं लेते हैं और यह मानते हैं कि यह एक टीम का संयुक्त प्रयास था।
हालांकि किस तरह से इस स्वीकृति को लेने के लिए काम किया गया, इसे समझाते हुए मेनन कहते हैं, ‘यह बहुत कुछ जुजित्सू के खेल की तरह था, जहां आप अपनी जीत के लिए अपने विरोधी के भार का इस्तेमाल भी करते हैं।’ कम ही लोग जानते हैं कि अमेरिका को भी यह बात तब तक पता नहीं थी कि चीन इस डील को लेकर भारत का समर्थन करेगा, जब तक उसे भारत ने नहीं बताया था।
अमेरिका ने बड़ी हैरानी के साथ भारत से पूछा, ‘क्या आपको पूरा विश्वास है?’ अमेरिका को तब जाकर इस बात का विश्वास हुआ जब भारत ने पेइचिंग से मिले संदेश उन्हें दिखाए।
सूत्रों के अनुसार इन रिपोर्टों में कम ही सच्चाई है कि अमेरिकी विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस ने चीनी नेताओं हू जिंताओ और वेन जिआबाओ से बात कर यह कहा था कि वे अपने मत पर एक बार फिर से विचार करें और भारत को समर्थन देने का मन बनाएं।