सुपौल जिले की भारत-नेपाल सीमा पर भीमनगर बांध के किनारे पॉलिथिन लगाकर बैठे रविन्दर पासवान, राधे पासवान, देवेंद्र पासवान समेत सैकड़ों लोगों को पिछले 18 दिनों से खाना तक नसीब नहीं हुआ है।
ये लोग स्थानीय लोगों और स्वयंसेवी संस्थाओं की ओर से मुहैया कराए गए भूजा-चना चबाकर किसी तरह जान बचा रहे हैं। अपने 4 बच्चों और पत्नी के साथ यहां शरण लिए सुरेश पासवान ने बताया कि बच्चे जब भूख से बिलबिलाने लगे, तो मंगलवार को 6 किलोमीटर दूर जाकर किसी तरह एक शिविर से खिचड़ी मांगकर लाया हूं।
गांव के मुखिया भुवनेश्वर पासवान भी इसी कैंप में हैं, उनकी पत्नी बीमार है और वह इलाज के लिए भटक रहे हैं। सुपौल जिला मुख्यालय से आगे बढ़ने पर हर कस्बे में छोटे-बड़े स्कूल में शरणार्थी शिविर लगाए गए हैं। स्थानीय लोग इसका संचालन कर रहे हैं, जो किसी तरह चंदा जमा कर गेहूं, चावल और दाल का इंतजाम कर यहां रह रहे लोगों के खाने का इंतजाम कर रहे हैं।
उधर, शिविरों में भूख और बीमारी की वजह से मौत ने भी पांव पसारना शुरू कर दिया है। भीमनगर बांध पर रह रहे रविन्दर ने बताया कि भूजा-चना खाकर बच्चे बीमार हो रहे हैं, साथ ही तेज धूप और रुक-रुक कर बारिश होने से स्थिति और बिगड़ गई है। जरूरी चिकित्सा के अभाव में करीब 400 लोगों के इस शिविर में अब तक दो बच्चे दम तोड़ चुके हैं।
नेपाल भी प्रभावित
भीमनगर बैराज के पास ही नेपाल की सीमा में बांध पर भंटाबाड़ी गांव के मोहम्मद रोजिद और मोहम्मद सजताद कैंप में रह रहे हैं। जब बांध टूटा, तो नेपाल के हरिपुर, श्रीपुर, जमुआ, भंटाबाड़ी सहित 8 गांव प्रभावित हुए। जहां के लोगों ने अपना घर-बार छोड़कर पॉलिथिन के नीचे शरण ले ली। नेपाल प्रशासन ने उनका कार्ड बना दिया है और उन्हें राशन दिया जा रहा है।
साथ ही भारत के भीमनगर, लालपुर, संतुपर, बलुआ, भवानीपुर, नरहुआ, सहित सुपौल जिले के तमाम ग्रामीणों ने भी नेपाल के रानीगंज, लौकही, इनरवा सहित अन्य गांवों में शरण ली है। नेपाली प्रशासन और वहां के व्यवसायी अपनी क्षमता के मुताबिक उनकी मदद कर रहे हैं। नेपाल के विभिन्न इलाकों से उनके लिए खाने के पैकेट आ रहे हैं।
राहत और बचाव कार्य जिला प्रशासन की ओर से 48 मोटरबोट और 250 निजी नाव लगाई गई हैं। 42 राहत शिविर खोलकर 65,000 विस्थापितों के लिए इंतजाम किया गया है। साथ ही 20 स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए हैं। सुपौल के जिलाधिकारी श्रवण कुमार ने कहा कि 73 पंचायतों के 273 गांवों के 89,3790 लोग और 4,50,000 पशु बाढ़ से प्रभावित हुए हैं, जबकि 22,367 कच्चे और 2233 पक्के मकान क्षतिग्रस्त हुए हैं।
साथी हाथ बढ़ाना
सहरसा से सुपौल जाते समय सेना की टुकड़ी परसैया गांव के पास मिली, जो राहत और बचाव कार्य के लिए जा रही थी। सुपौल से भीमपुर बढ़ने पर स्कूलों और सड़कों पर सेना का दस्ता नजर आ रहा था। दुश्मनों से लोहा लेने वाले सेना के ये जवान बाढ़ से लोगों को बचाने में पूरी मुस्तैदी से जुटे हुए हैं। सेना के जवान अब भी पानी की मुख्य धारा से लोगों को निकालने के लिए जूझ रहे हैं।
बहरहाल, सारी व्यवस्था पीड़ितों की संख्या अधिक होने के कारण नाकाफी साबित हो रही है। बाढ़ पीड़ित इलाके मधेपुरा और सहरसा में जलस्तर करीब 2.5 फुट कम हुआ है, वहीं पूर्णिया और किशनगंज के तमाम नए इलाकों में पानी घुस गया है।
बाढ़ क्षेत्रों से निकले लोगों के किसी भी शिविर में जैसे ही कोई वाहन चना-भूजा लेकर पहुंचता है, सैकड़ों लोग टूट पड़ते हैं। लोगों को अब भी उम्मीद है कि सरकार कम से कम दो जून के खाने का इंतजाम करेगी।