सरकार चलाए तीर-तुक्का, भोली जनता करे अजब टोटका

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 3:00 PM IST

अंग्रेजों की गुलामी के दौर की ब्लैक एंड व्हाइट फिल्में हों या फिर चांद पर यान भेजने की तैयारी करते नए और शक्तिशाली भारत के मौजूदा दौर की फिल्में, सभी में कम से कम एक बात तो परंपरागत ही नजर आएगी।


वह यह कि जब भी किसान और खेती से जुडी क़हानी होगी तो अच्छी फसल के लिए किसान काले मेघा के बरसने के लिए इंद्र देवता की गुहार लगाते हैं। जहिर है, फिल्में समाज का आईना होती हैं। और इनसे यह साबित हो जाता है कि 21वीं सदी में भले ही सब कुछ बदल चुका हो लेकिन किसानों की नियति नहीं बदल सकी।

आज भी भारतीय किसान कृषि के लिए मानसून पर निर्भर हैं। जिस साल मानसून अच्छा रहता है, उस साल किसानों के चेहरे पर सुकून की लकीरें साफ पढ़ीं जा सकती हैं, लेकिन जब मानसून मुंह मोड़ लेता है, तो किसानों के सामने रोटी के लाले पड़ जाते हैं। यही नहीं, इसके चलते खाद्यान्न संकट की स्थिति में सरकार को भी भारी निर्यात करना पड़ता है, जिससे सरकारी खजाने में तो सेंध लगती ही है, अर्थव्यवस्था कि विकास दर भी मंद पड़ जाती है।

हालत यह है कि बारिश ज्यादा हो या कम, दोनों ही सूरतों में उम्मीदों पर पानी फेर देती है। यही नहीं, मौसम विभाग भी जिस तरह से मानसून की भविष्यवाणी करता है, वह भी तीर या तुक्के की तर्ज पर होती है। वजह- परंपरागत तकनीक। सरकार न तो भविष्यवाणी की तकनीक विकसित करने में खास रुचि लेती नजर आती है और न ही कृषि के विकास के लिए दृढ़संकल्प दिखती है। यह हालत तब है, जब कृषि पर देश की तकरीबन 60 फीसदी जनसंख्या निर्भर है।

वहीं सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान करीब 25 फीसदी है। यही नहीं, उद्योग भी कच्चे माल के लिए बहुत हद तक कृषि पर निर्भर हैं, वहीं तमाम कंपनियों के उत्पादों की बिक्री भी मानसून पर निर्भर करती है। साबुन-शैंपू की बात करें या फिर मोटरकार की, ग्रामीण इन वस्तुओं के बड़े खरीदार हैं। ऐसे में फसल के नुकसान होने से किसानों के साथ-साथ उद्योग जगत की उम्मीदों पर भी पानी फिर जाता है। इसके अलावा, सरकार के सत्ता में बने रहने या फिर उसकी विदाई में भी मानसून का बहुत बड़ा हाथ होता है।

आज महंगाई जिस कदर सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है, वह कृषि की उपेक्षा और मानसून पर निर्भरता का ही परिणाम है।  यही वजह है कि महंगाई से त्रस्त कांग्रेस नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार इस साल बेहतर मानसून की राह ताकती नजर आई। सरकार के तमाम नेता-मंत्री गाहे-बेगाहे अपने भाषण में यह कहने से नहीं चूके कि इस साल मानसून बेहतर रहेगा। मानसून पर इतनी निर्भरता की वजह भी है। हमारे देश की 45 फीसदी भूमि पर खेती होती है, लेकिन इनमें से तकरीबन 70 फीसदी क्षेत्र में फसलों की पैदावार मानसून पर निर्भर है। इसी कारण मानसून के न आने पर आज भी हमारे देश में इंद्र देवता को मनाने के लिए कहीं कुंए में बैठकर रामायण का पाठ होता है, तो कहीं मासूमों की बलि चढ़ाई जाती है।

आखिर, विज्ञान के इस युग में मानसून पर ऐसी निर्भरता क्यों? सरकार अगर समय रहते सिंचाई, आधुनिक तकनीक और उन्नत बीज-खाद की व्यवस्था करे, किसानों को वैज्ञानिक ढंग से खेती के लिए प्रेरित करे, तो समूची तस्वीर ही बदल सकती है। अगर विकसित देशों की बात करें, तो वहां के किसान भारत की अपेक्षा ज्यादा संपन्न और समृद्ध हैं। कारण- सरकार वहां कृषि विकास की तमाम योजनाएं बनाती हैं और उसे हकीकत के धरातल पर उतारा जाता है, लेकिन भारत में योजनाएं फाइलों में ही दम तोड़ देती हैं। अगर ऐसा न हो तो हमारे पास आखिर किस बात की कमी है?

गंगा-जमुना जैसी तमाम नदियां यहां खेतों को सिंचित करती हैं, तभी तो कभी यहां की धरती सोना-चांदी उगला करती थी। बस जरूरत है, दृढ़संकल्प और बेहतर प्रबंधन की। नदियों को आपस में जोड़ने की महत्वाकांक्षी योजना की स्थिति भी नौ दिन चले ढाई कोस वाली ही रही। विशेषज्ञों की सलाह है कि मानसून पर निर्भरता कम करने के लिए नहरों का जाल बिछाया जाना चाहिए। इसी तरह, बाढ़ से बचाव के लिए तमाम योजनाओं को फाइलों से निकालकर हकीकत का अमलीजामा पहनाना होगा।

उन्नत बीज, जल संचयन और मौसम की भविष्यवाणी के लिए नई तकनीक को अपनाना होगा, तभी खुशहाल और शक्तिशाली भारत का सपना साकार होगा। वैसे विशेषज्ञों का एक तबका यह भी कहता है कि मानसून पर निर्भरता को कृषि पिछड़ेपन के लिए पूरी तरह जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। उनके मुताबिक, पहले भी मानसून पर निर्भरता थी, लेकिन अनाज के मामले में भारत आत्मनिर्भर था। 1960 के दशक की बात करें, जब हरित क्रांति आई, तब देश में गेहूं की पैदावार में अप्रत्याशित रूप से बढ़ोतरी हुई थी।

ऐसी ही क्रांति हर क्षेत्र में लाने की जरूरत है, तभी हम कृषि के मामले में आत्मनिर्भर हो सकेंगे और भारत जिस महाशक्ति बनने का ख्वाब देख रहा है, वह साकार हो सकेगा। बहराहल, इस मुद्दे पर व्यापार गोष्ठी के तहत बिजनेस स्टैंडर्ड को पाठकों और विशेषज्ञों की ढेरों प्रतिक्रियाएं मिलीं। ज्यादातर लोगों का भी यही कहना था कि मानसून पर निर्भरता को कम कर विकास की नई कहानी गढ़ी जा सकती है।

First Published : August 4, 2008 | 2:38 AM IST