इन्फ्रास्ट्रक्चर का सामान्यत: आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान होता है। एशिया प्रशांत फिच के ग्लोबल इन्फ्रास्ट्रक्चर एंड प्रोजेक्ट फाइनेंस के प्रमुख विलियम स्ट्रीटर का मानना है कि संस्थागत और क्रियात्मक सुधार से पूंजी की उगाही में आसानी होनी चाहिए।
पेश है बिजनेस स्टैंडर्ड से उनकी बातचीत के कुछ प्रमुख अंश
इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में आप क्या बदलाव देख रहे हैं?
हम देश की संस्थागत और क्रियात्मक क्षमताओं की तरफ ध्यान केन्द्रित कर रहें हैं। नए परियोजनाओं के लिए अनुमति प्रदान करने में सरकर की भी सीमाएं हैं और इसके अलावा बैंक भी एक सीमा तक ही वित्तीय सहायता प्रदान कर सकने में सक्षम होते हैं। साथ ही प्रायोजक भी परियोजनाओं की संख्या को लेकर खासे चिंतित रहते हैं। मेरा मानना है कि सरकार को पूंजी उगाही की योजनाओं पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित करना चाहिए और इसे प्राथमिकता देनी चाहिए।
विभिन्न परियोजनाओं जैसे हवाई अड्डा निर्माण में होने वाली देरी के बारे में आपकी क्या राय है?
ईंधन और इस्पात की बढ़ती कीमतों के अलावा ब्याज दरों में हो रही बढ़ोतरी जैसी समस्याएं कुछ ज्यादा ही मुखर होती नजर जा रही है। परियोजनाओं को फंड आसानी से उपलब्ध होने के लिए यह जरूरी है कि वह बेहतर और आर्थिक दृष्टिकोण से टिकाऊ हो। बैकों द्वारा बढ़ती ब्याज दर भी दिनों दिन एक चुनौती बनती जा रही है।
परियोजनाओं के लिए पैसों की कमी एक समस्या है या इन्फ्रास्ट्रक्चर को डिजाइन कर पाने मेंकार्यकुशलता का अभाव?
पाइपलाइन में पड़ी परियोजनाएं निवेशकों के लिए चिंता का कारण खासकर अंतर्राष्ट्रीय निवेशकों के लिए चिंता का कारण बनता जा रहा है। परियोजनाओं के खाका तैयार होने, उसके मंजूर किए जाने और लागू होने में एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। उदाहरण के लिए फिलहाल हम जेएनएनयूआरएम पर काम कर रहें हैं और इसके लिए हमने भारत में एक पब्लिक फाइनेंस का प्रबंध किया है।
हम विभिन्न शहरों में काम कर रहें हैं और कई शहरों में हमने देखा है कि जो लोग इन योजनाओं में संलंग्न होते हैं वे इनका नियंत्रण अपने हाथों में ले लेते हैं। वे अपनी प्राथमिकताओं को समझते हुए अपने आर्थिक विकास के लक्ष्य को इन्फ्रास्ट्रक्चर में होनेवाले निवेश से जोड़कर देखते हैं। दूसरी तरफ कु छ शहरों में लोग सिर्फ कं सलटेंट पर निर्भर रहते हैं। सरकारी स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन की अधिक संभावनाएं दिखाई देती है। अगर आपूर्ति को नियमित नहीं रखा जाता है तब सेकेंडरी मार्केट पर इसका प्रतिकूल असर पड़ता है जबकि प्राइमरी मार्केट भी इससे प्रभावित होता है।
धन की कमी के कारण क्या आपूर्ति के और अधिक प्रभावित होने के आसार हैं?
इसका मांग पर असर पड़ेगा। अगर पूंजी की उपलब्धता समस्या बनती है तब ऐसी स्थिति मेंमार्जिनल प्रोजेक्ट के समाप्त होने की स्थिति बन सकती है जोकि हमें पूरे एशिया में देखने को मिला है। हमारा पूरा ध्यान उन परियोजनाओं को आगे बढ़ाने पर है जो आर्थिक रूप से ज्यादा फायदेमंद और टिकाऊ और विपरीत परिस्थतियों का सामना कर सकने में सक्षम होते हैं।
आप की कौन सी परियोजना भारत में मार्जिनल साबित हो सकती है?
हमारे पास सात परियोजनाएं हैं और शुरुआती अवलोकन से पता चलता है कि पिछले दो सालोंमें एमआईबीओआर पर लेंडिंग रेट में कोई मार्जिन नहीं मिला है। इस बात की आशंका है कि क्रेडिट जुटाने की किसी संभावनाओं के बिना ही मार्जिनल प्रोजेक्ट समाप्त हो जाएंगे।