इस साल की शुरुआत में कई-कई विश्लेषकों ने बड़े-बड़े दावे किए थे कि साल के आखिर तक शेयर बाजार 30 हजार के आंकड़े को छू लेगा, लोगों को मोटा मुनाफा होगा और भारतीय शेयर बाजार अमेरिकी मंदी से परेशान दुनिया भर के निवेशकों के लिए मक्का-मदीना हो जाएगा।
लेकिन मार्च आते-आते यह सारे वादे जमीन की धूल चाटते नजर आए। लोगों के लिए अपना पैसा तक निकालना मुश्किल हो चुका था। विदेशी निवेशकों ने तेजी से अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया था। यह सिलसिला अब तक जारी है। छह महीने की इस अमावस्या के बीच कुछ चांदनी रातें भी आईं हैं, लेकिन उनकी तादाद को आप उंगुलियों पर गिन सकते हैं।
ऐसे में अब लोगों की निगाहें उन सरकारी कंपनियों पर टिकी हुई है, जिनके आईपीओ आने वाले हैं। ज्यादातर निवेशकों को उम्मीद है कि मंदी की इस काली घनी रात में यही आईपीओ उनके लिए उजाले की किरण बनकर आएगी। कई विश्लेषकों की मानें तो मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत हासिल करने के बाद यह उम्मीद और भी बलवती हो गई है।
उन्हें उम्मीद है कि अब सरकार आर्थिक सुधारों की गाड़ी को तेजी से आगे बढ़ाएगी और इसलिए अब कई सरकारी कंपनियां भी शेयर मार्केट में उतरेंगी। इससे शेयर बाजार से रूठ चुके निवेशक वापस इसकी तरफ रुख करेंगे। विश्लेषकों का कहना है कि मुनाफा कमा रही सरकारी कंपनियों में अपना हिस्सा थोड़ा सा कम करने की राह में वामपंथियों का रोड़ा हटने के बाद सरकार के सामने दिक्कतें भी नहीं आनी चाहिए।
फरवरी के बाद से ही शेयर बाजार का मूड खराब है, लेकिन ऐसे वक्त में भी सरकारी कंपनियों के शेयर अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। अब मिसाल के तौर स्टेट बैंक के शेयरों को ही ले लीजिए। 1993-94 में यह 100 रुपये के शेयरों के साथ बाजार में उतरा था। बुलंदी के दिनों में इसके एक शेयर की कीमत 2200 रुपये तक चली गई थी।
लेकिन आज की तारीख में भी यह 1400-1500 प्रति शेयर के भाव से कारोबार कर रहा है। यह कोई कम रकम नहीं है। दूसरी तरफ विश्लेषकों का यह भी मानना है कि केवल पैसे इकट्ठा करने के मकसद से ही सरकारी कंपनियां कभी आईपीओ नहीं लाती। उनका मकसद आम लोगों के दिल में बाजार के प्रति भरोसा भी मजबूत करना होता है। इसलिए तो वे काफी कम कीमत पर अपने शेयरों को बेचती हैं।
पहले भी सरकारी कंपनियों के शेयरों ने शेयर बाजार को लाज बचाई है। मिसाल के तौर पर इस साल की शुरुआत में रुरल इलेक्ट्रीफिकेशन कॉर्पोरेशन (आरईसी) का आईपीओ ऐसे वक्त आया, जब वॉकहॉर्ट और एम्मार जैसे बड़ी-बड़ी कंपनियों के आईपीओ को निवेशकों ने बैरंग वापस कर दिया था।
सवाल उठने लगे थे कि क्या भारतीय शेयर बाजारों का जादू उतर चुका है, लेकिन आरईसी के आईपीओ ने निवेशकों की बेरुखी खत्म कर दी। इसलिए आज जब बीएसएनएल, न्यूक्लियर पॉवर कॉर्पोरेशन, कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया, कोल इंडिया, राइट्स, ऑयल इंडिया, एनएचपीसी, दामोदर वैली कॉर्पोरेशन सहित 24 सरकारी कंपनियों शेयर बाजार में उतरने की तैयारी कर रही है, तो लोगों में उत्साह बहुत हद तक वाजिब भी है।
सरकारी कंपनियों के उतरने से कई लोग उत्साहित तो हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें ज्यादा खुशी नहीं हो रही है। उनका यह मानना है कि इससे कुछ खास नहीं हासिल नहीं होगा। कई विश्लेषकों का मानना है कि आज हमारे शेयर बाजार दुनिया के शेयर बाजार से काफी हद तक घुलमिल गए हैं। जब तक दुनिया के बाकी हिस्सों में आर्थिक स्थिरता नहीं आती, अपने मुल्क के शेयर बाजार के हालात में भी ज्यादा सुधार की गुंजाइश नहीं है।
उनके मुताबिक सरकारी कंपनियों के शेयर बाजार में उतरने से कुछ दिनों तक तो दलाल स्ट्रीट पर काफी गहमागहमी रहेगी, लेकिन उत्साह के ठंडा पड़ते ही बाजार फिर से आज के स्तर पर आ जाएगा। साथ ही, इस आर्थिक उथल-पुथल के दौर में देश की माली हालात पर भी काफी असर पड़ा है। इस वित्त वर्ष में हमारे मुल्क का राजकोषीय घाटा जीडीपी के छह से सात फीसदी रहने की उम्मीद है।
साथ ही, महंगाई और मंदी की मार की वजह से कई निवेशक ऐसी हालत में ही नहीं हैं कि वे निवेश के बारे में सोच पाएं। विशेषज्ञों के मुताबिक जब तक हालात नहीं सुधरते, कई मोटे विदेशी आसामी अपने मुल्क का रुख नहीं करेंगे।
बहरहाल, इस मुद्दे पर हमें पाठकों और विशेषज्ञों की ढेरों चिट्ठियां मिलीं। उनमें कई लोगों का कहना है कि सरकारी कंपनियों के शेयर बाजार में उतरने से शेयर बाजार का भला होगा। दूसरी तरफ, हमारे कई पाठकों का यह भी कहना है कि सरकारी कंपनियों के कामकाज तरीकों की वजह से लोगों का भरोसा जम नहीं पाता है, इसलिए उनके आईपीओ से भी ज्यादा फायदा नहीं होने वाला है। ऊपर से मुद्रास्फीति और मंदी ने भी हमारे नाक में दम कर रखा है।