यूपीए को चुनाव में एक ही गठबंधन हरा सकता है और वह है…

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:40 AM IST

गब्बर सिंह को एक ही आदमी मार सकता है…और वह है खुद गब्बर!


बॉलीवुड की सबसे हिट फिल्मों में से एक ‘शोले’ के किवदंती बन चुके किरदार गब्बर सिंह का यह डायलॉग लगता है कि यूपीए सरकार पर बिल्कुल सटीक बैठता है।

क्योंकि 2004 के आम चुनावों में जब ‘इंडिया शाइनिंग’, ‘फील गुड’ और ‘भारत उदय’ की सत्तारूढ़ बीजेपी नीत एनडीए की अति-आत्मविश्वासी तान के खिलाफ ‘आम आदमी’ के सादगी भरे नारे से भी जीत हासिल कर वह सत्ता में आई, तो चार साल उसे मारने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने के बावजूद एनडीए कुछ न कर सका।

मगर इस दौरान तमाम करिश्माई आर्थिक चमत्कार करने के बावजूद ‘खुद गब्बर’ की तर्ज पर यूपीए ने ही खुद ऐसी गलतियां कर दीं, जिससे एनडीए को इस बार सचमुच ‘फील गुड’ होने लगा। बेशक यूपीए के इस दावे में रत्ती भर भी झूठ नहीं है कि उसके चार सालों के दौरान न सिर्फ देश की विकास दर 8.9 फीसदी के औसत पर रही बल्कि तमाम मोर्चों पर देश वाकई चमकने लगा। और इसमें भी कोई दो राय नहीं कि एनडीए सरकार ने 2004 में जो आर्थिक सूरते-हाल यूपीए को सौंपा था, उसमें इसने हर लिहाज से चार चांद ही लगाए हैं।

चाहे वह विकास दर हो या विदेशी मुद्रा भंडार, सेंसेक्स और कारोबारी जगत की उड़ान हो या फिर सकल घरेलू उत्पाद, हर कहीं यूपीए सरकार की आर्थिक नीतियों ने सोने में सुहागा सरीखा काम किया। और जाहिर है कि इस मेहनत का मीठा फल भी उसे आने वाले चुनावों में मिलता। लेकिन बदकिस्मती से मीठा खाने की उसकी इसी ललक ने उससे ऐसे काम भी करवा दिए, जो कि उसके लिए चुनावी डायबिटीज के कारण बन गए।

मसलन, आम आदमी के मीठे चुनावी वोट के लिए उसने चार सालों तक न के बराबर पेट्रोल-डीजल-गैस की कीमतें बढ़ाईं और वह भी तब जबकि कच्चा तेल 200 डॉलर प्रति बैरल के आसमान पर पहुंचने को बेकरार होने लगा। उसकी इस कसरत से सरकारी खजाना खाली होता रहा, इस पर ध्यान दिए बगैर उसने किसानों का मीठा वोट पाने के लिए 71 हजार करोड़ की कर्ज माफी का ऐतिहासिक पैकेज भी घोषित कर दिया। यही नहीं, कर्मचारियों का मीठा वोट पाने के लिए उसने छठे वेतन आयोग में भी भारी वेतन बढ़ोतरी का ऐलान कर दिया।

इतना मीठा खाने के बाद उसे डायबिटीज के लक्षण तब भी नजर नहीं आए, जब राजस्व घाटा बढ़ने लगा। उसकी नींद तो तब टूटी, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की आग दावानल बन गई और कई देशों में खाद्यान्न संकट गहराने लगा। तब जाकर उसने ईंधन की कीमतें बढ़ाईं मगर तब तक देर हो चुकी थी। उसकी इस नासमझी के चलते ही सोया हुआ महंगाई का नाग जागकर आम आदमी समेत खुद उसे ही डसने के लिए फुफकारने लगा।

फिर उसका फन कुचलने के लिए जब सरकार ने जब कड़ी मौद्रिक नीति का हथियार उठाया तो वह बढ़ी हुई ब्याज दरों के रूप में लोगों को चोट तो पहुंचाने ही लगा, कारोबारी जगत पर भी मंदी की गहरी मार पड़ने लगी। यही नहीं, इसी के चलते जिस विकास दर की चमक का दावा करके वह सत्ता में दोबारा वापस आने का ख्वाब देख रही थी, वह चमक भी धुंधलाने लगी। खुद अपने हाथों से अपनी चमक धुंधलाने वाली इसी यूपीए सरकार ने एनडीए के सामने मानों थाली में परोस कर ढेरों हथियार दे दिए।

एनडीए के लिए तो अब बस इन्हें चलाना भर ही बाकी रह गया है। महंगाई के तीर से घायल आम आदमी, लुढ़कते शेयर बाजार, पेट्रोल-डीजल के बढ़ते दामों से झुलसते लोग, मंदी की मार झेलते उद्योग जगत… इन सभी को बस उसे मरहम ही लगाना है। जिसे लगाने में एनडीए ने एक पल की कोताही भी नहीं की है। मरहम लगाने के साथ-साथ वह यह दावा भी कर रहा है कि उसकी आर्थिक नीतियां हर लिहाज से बेहतर थीं।

उसे मालूम है कि लोगों का दर्द इस कदर ज्यादा हो चला है कि इस बात की परवाह शायद अब किसी को नहीं होगी कि एनडीए के छह सालों के 5.9 फीसदी के विकास दर के औसत के मुकाबले यूपीए काल में विकास दर का औसत डेढ़ गुने (8.9 फीसदी) से ज्यादा है। इसी तरह बाकी आर्थिक आंकड़े भी अगर उम्मीद से भी अच्छे रहे भी हैं तो भी इस दौर में यूपीए की कौन सुनेगा? इस चुनावी गणित के आंकड़े इस बार की व्यापार गोष्ठी में भी साफ उभर कर आए, जब बिजनेस स्टैंडर्ड के ज्यादातर प्रबुध्द पाठकों ने एनडीए की आर्थिक नीतियों को ही बेहतर बताया।

हालांकि अभी ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है, जो कि यूपीए की नादानियों को यह कहकर माफ कर देने के मूड में हैं कि अंतरराष्ट्रीय हालात मौजूदा बदहाली के लिए जिम्मेदार हैं। इसी तरह कुछ ऐसे भी हैं, जो पसोपेश में हैं। जहां तक आर्थिक विशेषज्ञों की बात है, तो एक विशेषज्ञ ने तो यूपीए को ही कारोबारियों के लिए बेहतर बताया तो दूसरे का कहना है कि सरकार किसी की भी हो, कारोबारियों का हित देखना उसकी मजबूरी होगी।

बहरहाल, पलड़ा तो उसका ही भारी होगा, जिसके खेमे में कृष्ण की तरह से जनता जनार्दन होगी। उम्मीद है कि अगली चुनावी महाभारत के शुरू होने से पहले रणभूमि के आंखों देखे हालात के साथ-साथ जनता जनार्दन किस ओर है, बिल्कुल संजय की भूमिका में बिजनेस स्टैंडर्ड भी यह बात आप तक व्यापार गोष्ठी के माध्यम से पहुंचा पाने में सफल होगा। 

First Published : June 30, 2008 | 1:37 AM IST