रिटेल रिपोर्ट, कहीं खुशी कहीं गम

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 1:44 AM IST

एक ओर जहां संगठित रिटेल इकाइयों ने इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स रिलेशंस (इक्रियर) की रिपोर्ट का स्वागत किया है, वहीं छोटे और असंगठित रिटेल इकाइयों में इस रिपोर्ट को लेकर मायूसी है।


इस रिपोर्ट के अनुसार बड़े संगठित रिटेल स्टोर्स के आने से खुदरा कारोबारियों और दुकानों पर कोई खतरा नहीं मंडरा रहा। जबकि, ये कारोबारी अब तक बड़े रिटेल स्टोर्स के खुलने का विरोध करते रहे हैं।

संगठित रिटेल श्रृंखलाओं का कहना है कि रिपोर्ट से निकले नतीजे कि आधुनिक रिटेल स्टोर्स खरीदार, विक्रेता और किसानों तीनों के लिए फायदेमंद हैं, बिल्कुल सही है। ग्रॉसरी रिटेल श्रृंखला सुभिक्षा के अध्यक्ष मोहित खत्तर का कहना है कि देश में रिटेल की अपार संभावनाए हैं। ऐसे में संगठित और असंगठित दोनों ही के लिए कारोबार के पर्याप्त अवसर हैं। 

एसोचैम के अध्यक्ष वेणुगोपाल धूत की इस बारे में राय है कि संगठित इकाइयों से बेरोजगारी को कम करने में मदद मिल सकती है। स्थानीय कारोबारी इकाइयों को लगता है कि बड़े रिटेल स्टोर्स के खुलने से किराने की दुकानों पर प्रतिकूल असर पड़ा है। एसोसिएशन ऑफ महाराष्ट्र के अध्यक्ष मोहन गुरनानी का कहना है, ‘ बड़े रिटेल स्टोर्स को पैर फैलाने का मौका दिया जाता रहा तो जल्द ही  छोटे कारोबारी खत्म हो जाएंगे।’

सीधी बात

काफी समय से कैश ऐंड कैरी रिटेल स्टोरों के प्रभावों को लेकर किए जा रहे जिस अध्ययन की रिपोर्ट का इंतजार किया जा रहा था, उसे जारी करने के बाद बिजनेस स्टैंडर्ड के सिद्धार्थ जराबी और रितुपर्ण भुइयां ने इक्रियर के निदेशक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी राजीव कुमार से बात की। उनसे की गई बातचीत के कुछ अंश:

इस अध्ययन के परिणाम जारी करने में काफी समय लगा और ऐसा माना जा रहा है कि जो निष्कर्ष निकल कर आए हैं वे सरकार (इस अध्ययन के प्रायोजक) के लिए सबसे अनुकूल हैं। इन आरोपों पर आपकी प्रतिक्रिया क्या है?

विलंब होने की दो वजहें हैं। एक तो हमें बाहर के लोगों से अध्ययन के सिलसिले में संपर्क स्थापित करना था। साथ ही हमनें दो बार वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के सामने प्रस्तुति दी। उन्होंने हमें कहा कि हमें अध्ययन पर थोड़ा और काम करना चाहिए। साथ ही यह सर्वेक्षण हमने खुद नहीं कराया बल्कि डीआरएस को आउटसोर्स किया। रही बात निष्कर्ष की तो मैं यह दावे के साथ कह सकता हूं कि ये बिल्कुल सटीक हैं। सर्वे के दौरान संगठित रिटेल सेक्टर के साथ हमारा कोई संपर्क नहीं था।

जिस दर से भारत में असंगठित रिटेल स्टोरों का सफाया हो रहा है, उसकी तुलना विकसित देशों से की गई है। इसके बारे में आप क्या कहेंगे?

ऐसा तर्क पेश किया जा रहा है कि तुलना विकासशील देशों से होनी चाहिए। हमनें ऐसा नहीं किया क्योंकि उभरती अर्थव्यवस्थाओं में असंगठित रिटेल इकाइयों का सफाया बड़ी तेजी से होता है। जबकि, विकसित देशों में क्योंकि परिवेश स्थिर होता है, वहां छोटे कारोबार को तेजी से उभरने का मौका मिलता है।

नीति निर्माताओं को इस रिपोर्ट को किस तरह से देखना चाहिए?

यह रिपोर्ट  छोटे और असंगठित रिटेल इकाइयों को संरक्षण और प्रोत्साहन देने के लिए हैं। भारतीय उपभोक्ता चाहते हैं कि संगठित रिटेल इकाइयों की तरह ही छोटी और खुदरा इकाइयां भी बनी रहें।

First Published : May 26, 2008 | 10:57 PM IST