ईसा से सैकड़ों बरस पहले जब चीन में बाकायदा तेल कुओं से काला सोना यानी कच्चा तेल निकालकर उसे इस्तेमाल करने की पहली इंसानी कोशिश शुरू हुई थी।
तो इसका अंदाजा उस वक्त शायद किसी को भी नहीं रहा होगा कि एक दिन यह सारी दुनिया की जीवन रेखा बन जाएगा। तब से लेकर अब तक, धरती से कच्चा तेल निकालकर ईंधन और ऊर्जा के प्रमुख स्रोत के रूप में दुनिया जिस अंधाधुंध तरीके से इसका दोहन करने में लगी है, उससे 2039 तक इसका भंडार धरती से खत्म हो जाने के अनुमान पहले ही लगाए जा चुके हैं। मगर इसकी चिंता इस होड में किसको है?
हर देश अपनी जरूरतों के लिए कच्चा तेल हर कीमत पर खरीदने को आमादा है। अपनी जरूरतों का 70 फीसदी कच्चा तेल आयात करने वाला भारत भी जिन कच्चे तेल की किस्मों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से खरीदता है, 2003 से लगातार उनकी कीमतों में इजाफा होता जा रहा है। मई 2003 में इसकी कीमत जहां 25 डॉलर प्रति बैरल थी, वह आज 130 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुकी है।
बकौल रिजर्व बैंक, एक बैरल कच्चे तेल की कीमत में एक डॉलर का इजाफा भारत के आयात बिल में 2800 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ डाल देता है। जाहिर है, 105 डॉलर प्रति बैरल की इस जबरदस्त बढ़ोतरी का असर सरकारी खजाने के लिए अभी तक कितना भारी पड़ चुका है, इसका अंदाजा लगाना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है।
यही नहीं, विशेषज्ञों का एक खेमा तो यह चेतावनी भी दे रहा है कि कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंच सकती हैं। यानी इस आग से जितना झुलस चुके, उससे कहीं ज्यादा के आसार अभी बाकी हैं। वैसे तो कच्चे तेल की कीमतों में लगी इस आग के लिए कुछ हद तक खुद भारत को भी जिम्मेदार माना जा सकता है क्योंकि भारत-चीन जैसे देशों में बढ़ती खपत के कारण ही इसकी मांग में हाल के बरसों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है।
इस बढ़ी हुई मांग के साथ-साथ इराक और ईरान में राजनीतिक अस्थिरता और अन्य प्रमुख तेल उत्पादक देश नाइजीरिया में जारी हिंसा ने भी कोढ़ में खाज सरीखा काम किया है। अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार की इस बदहाली के कारण कच्चे तेल की कीमतें तो बढ़ी ही हैं, लुढ़कते डॉलर ने भी भारत के लिए कच्चे तेल का आयात इस कदर महंगा कर दिया है कि उसे इसके लिए जरूरी रकम जुटाने में पसीने आने लगे हैं।
दूसरी ओर, कीमतें बढ़ाने के लिए दुनियाभर के देशों के आरोप झेल रहे तेल निर्यातक देशों के संगठन ओपेक की दलील है कि तेल उत्पादन या उसकी सप्लाई में कमी के कारण कीमतें नहीं बढ़ रही हैं बल्कि बतौर कमोडिटी निवेश करने वालों ने इससे मुनाफा कमाने के लिए आपा-धापी मचाकर इसमें आग लगाई है।
कीमतें किसी भी वजह से बढ़ी हों, उन वजहों पर काबू पाना भले ही भारत जैसे किसी एक देश के बूते की बात नहीं है लेकिन कच्चे तेल की इस आग में बेबसी से झुलसते जाने में भी तो कोई समझदारी नहीं है। जब यह साफ हो ही चुका है कि कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों ने देश की अर्थव्यवस्था की चूलें हिला दी हैं तो सरकार को अर्थव्यवस्था को ढहने से बचाने के लिए अब हर संभव कदम उठाने में जरा भी देर नहीं करनी चाहिए।
पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ाने या तेल बॉन्ड जारी करके तेल कंपनियों के घाटे की भरपाई करने से बात नहीं बनेगी। बल्कि बायोफ्यूल हो या बैटरी या फिर कोई अन्य वैकल्पिक ईंधन, हर संभव रास्ता अपना कर भारत को कच्चे तेल पर निर्भरता तेजी से घटाने के लिए ठोस नीति बनानी ही पड़ेगी। वरना सुरसा की तरह बढ़ते कच्चे तेल के आयात बिल के साथ-साथ कोई ऐसा क्षेत्र नहीं बचेगा, जहां कच्चे तेल की यह आग न पहुंचे।
इसी के चलते आज कृषि उत्पाद, खाद्यान्न, धातु जैसी हर जरूरी चीज दिनों-दिन महंगी होती जा रही है। कारोबारी जगत के लिए लागत का खर्च भी इसी वजह से लगातार बढ़ता जा रहा है। बहरहाल, प्रबुध्द पाठकों ने इस जटिल मगर बेहद गंभीर समस्या से निबटने के लिए ढेरों सुझाव जाहिर किए। दो विशेषज्ञों ने भी इस मसले पर विचार-विमर्श कर सिर पर मंडरा रहे संकट के बादलों से बचने की जुगत ढूंढ़ने की पुरजोर कवायद की। आइए देखते हैं, क्या निष्कर्ष निकल कर आया इस बार की व्यापार गोष्ठी में।
मैं अपना धन सूर्य और सौर ऊर्जा पर खर्च करना चाहूंगा। वास्तव में ऊर्जा का यह बेहतरीन स्रोत है। मुझे आशा है कि इस दिशा में कदम बढ़ाने केलिए हम कोयला और तेल के इस धरती से गायब होने तक का इंतजार नहीं करेंगे। – थॉमस एडीसन, 1931
तकनीक एक महान हथियार है लेकिन इसकी भी कुछ सीमाएं हैं। पिछले पांच साल में हर साल हमने 27 अरब बैरल तेल का उपभोग किया लेकिन तेल उद्योग ने इस दौरान सालाना केवल 3 अरब बैरल तेल खोजा। इसका मतलब यही हुआ कि हम जो 9 अरब बैरल तेल का उपभोग करते हैं उसकी तुलना में केवल 1 बैरल तेल खोजा जाता है। – अमेरिकी जैविक सर्वेक्षण में एल.बी. मैगून रिपोर्ट से
किसी देश के अर्थिक हित उस चीज में नहीं है, जो उसके नागरिकों के जिंदा रहने के लिए जरूरी हैं बल्कि उस चीज में हैं, जिसकी वजह से जंग छिड़ सकती है। गेहूं की तुलना में तेल हमेशा से लड़ाई की प्रमुख वजह रहा है और आगे भी इसके जारी रहने की पूरी आशंका है। – अज्ञात