यूं ही बेचैन नहीं हैं खुदरा बाजार के सागर में छोटी मछलियां

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 12:41 PM IST

बड़ी मछली हमेशा छोटी मछली को निगल जाती है। जाहिर है, इस पुरानी कहावत को मानने से किसी को गुरेज नहीं होगा।


यही वजह है कि देश के खुदरा कारोबार की छोटी मछलियां यानी छोटे दुकानदार एक बड़ी मछली यानी मॉल के आने से थर्राए हुए हैं। इसीलिए चाहे वह प. बंगाल हो, उत्तर प्रदेश या देश का कोई और राज्य, कमोबेश हर जगह पर छोटे कारोबारी एकजुट होकर संगठित रिटेल के जरिए देशभर के खुदरा बाजार को हथियाने में जुटीं देसी-विदेशी कंपनियों के खिलाफ ऐलान-ए-जंग करने पर आमादा हैं।

उनकी इस जंग की रफ्तार सरकार समर्थित इक्रियर की उस हालिया रिपोर्ट से भी कम नहीं हो सकी, जिसमें उन्हें संगठित रिटेल से कोई खतरा न होने का दिलासा देने की भरपूर कोशिश की गई थी। और हो भी कैसे, जब उनके आस-पास कुकुरमुत्ते की तरह से डिपार्टमेंटल स्टोर, हाइपरमार्केट, सुपरमार्केट और मॉल उगते ही चले जा रहे हों।

पश्चिमी शैली में खरीदारी के ये चमचमाते और भव्य ठिकाने न सिर्फ बड़े शहरों में बल्कि कस्बों और गांवों के छोटे दुकानदारों की रोजी-रोटी के लिए खतरा बनते जा रहे हैं। बड़ी कंपनियों के बीच शहरों-कस्बों और गांवों में इस कदर घमासान मचने की वजह भी साफ है और वह है देश का तकरीबन 15000 अरब रुपये का खुदरा बाजार। इस विशालकाय बाजार में वैसे तो फिलहाल संगठित रिटेल कंपनियों की हिस्सेदारी महज लगभग 350 अरब रुपये की है लेकिन केएसए-टेक्नोपाक के मुताबिक 2010 तक यह बढ़कर तीन गुना से ज्यादा हो जाएगी।

उनकी इस हिस्सेदारी बढ़ने की सबसे बड़ी वजह है, अमूमन आस-पास की छोटी दुकानों से खरीदारी करने वाले देश के मध्यम वर्ग की जीवनशैली, सोच और क्रय शक्ति में पिछले चंद बरसों से होने वाला बदलाव। देश की अर्थव्यवस्था के 8 से 10 फीसदी के बीच विकास करने के कारण आज मध्यम वर्ग अपनी पसंद और खरीदारी में ब्रांड के लिए थोड़े ज्यादा पैसा खर्च करने में भी हिचकिचाता नहीं है। लिहाजा वह नजदीक की किसी छोटी-मोटी दुकान को दरकिनार कर दूर के किसी ब्रांडेड स्टोर का ही रुख करना पसंद करता है।

जबकि 90 के दशक तक, जब देश में चंद ही मॉल हुआ करते थे, अधिकतर लोग गली-कूचे या किसी नजदीकी बाजार की दुकानों में ही चहलकदमी करने के शौकीन थे। क्योंकि इन दुकानों में भले ही ब्रांड का कोई साझा नेटवर्क न रहा हो लेकिन अक्सर खरीदारी करने के कारण उधार जैसी सहूलियतें देकर ये दुकानदार लोगों के दिलों पर राज करने में कामयाब रहते थे। लेकिन जैसे ही अंतरराष्ट्रीय अंदाज में डिजाइन किए हुए खूबसूरत और भव्य मॉल्स के कदम बाजार पर पड़े, संगीतमय लहरियों से गूंजते, हाई स्पीड लिफ्ट या एस्केलेटर, मल्टीप्लेक्स थिएटर और भव्य रेस्तरांओं से लैस ये सेंट्रली एयरकंडीशंड मॉल लोगों की पसंद बन गए।

परंपरागत बाजार की धक्का-मुक्की से किनारा कर लोगों का रुख खुद ब खुद इन मॉल्स की ओर हो गया। लोगों की मानसिकता और व्यवहार में आए इसी जबरदस्त बदलाव को देखकर चंद विशेषज्ञ भी अब मानने लगे हैं कि अगले दो दशकों के बाद शायद छोटी दुकानों के लिए अपना अस्तित्व ही बचा पाना मुश्किल हो जाएगा। इसी दहशत में छोटे कारोबारियों के संगठन अब सरकार से मांग करने लगे हैं कि मॉल के खुलने पर पाबंदी भले ही न लगाई जाए मगर इन पर टैक्स की वसूली बढ़ाई जाए और इससे मिली रकम को छोटे कारोबारियों को कारोबार विस्तार आदि के लिए बतौर कर्ज मुहैया कराया जाए।

वैसे यह मसला न सिर्फ छोटे कारोबारियों के हितों से जुड़ा हुआ है बल्कि सरकार के लिए भी खासी अहमियत रखता है। क्योंकि देश के तकरीबन 1.4 अरब छोटे-मझोले दुकानदारों की रोजी-रोटी छिनने का सीधा असर देश के आर्थिक विकास पर पड़ना लाजिमी है। मॉल्स के चलते मान लेते हैं कि इनमें से सभी भले ही बेरोजगार नहीं होंगे लेकिन एक बड़ा हिस्सा अगर बेरोजगार हो गया तो भी यह कोई छोटी-मोटी समस्या नहीं होगी। सरकार भी अगर संगठित रिटेल कंपनियां के इस दावे को ही मानकर हाथ पर हाथ धरे बैठे रही कि देश में लाखों बेरोजगार लोगों को वह रिटेल क्षेत्र में रोजगार मुहैया कराने का महती काम कर रही हैं तो फिर स्वरोजगार में लगे इन करोड़ों लोगों के पेट पर पड़ने वाली लात से इन्हें कौन बचाएगा।

बहरहाल, इस बार की व्यापार गोष्ठी में बिजनेस स्टैंडर्ड ने इस बात की पूरी कोशिश की है कि न सिर्फ छोटे-मझोले कारोबारियों में फैली दहशत से प्रबुध्द पाठकों को रूबरू कराया जाए बल्कि आर्थिक विशेषज्ञों से भी इस समस्या के विश्लेष्णात्मक पहलू पर नजर डाली जाए।

ताकि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, प. बंगाल और झारखंड सरीखे देश के कमोबेश सभी राज्यों में हो रहे संगठित रिटेल के विरोध को विचार-विमर्श की रोशनी डालकर सरकारी नीति नियंताओं की मोतियाबिंदी आंखों तक भी पहुंचाया जा सके। इसमें हर बार की तरह हमें पूरा सहयोग किया हमारे जागरूक पाठकों ने, जिन्होंने पक्ष या विपक्ष में अपने तर्कों को रखते हुए व्यापार गोष्ठी के नाम को सार्थक बनाया।

First Published : July 21, 2008 | 1:57 AM IST