सब पर नहीं चलता वादों का ‘मायाजाल’

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 06, 2022 | 11:06 PM IST

बारह महीने पहले बसपा सुप्रीमो मायावती ने बहुजन के बजाए सर्वजन का नारा लगा कर जनता को लुभाया। बेहतर शासन देने का वादा किया लेकिन शायद सबको खुश रखना इतना आसान नहीं है।


 कई मसलों पर सरकार का रुख साफ न होने से आशंका और चिंता का माहौल है। 23 अगस्त 2007 को राज्य सरकार ने प्रदेश में मौजूद रिलायंस फे्रश के सभी स्टोर बंद करने का फरमान जारी किया।


नतीजतन कंपनी को यहां अपने रिटेल स्टोर खोलने के फैसले को बदलना पड़ा और अपने कर्मचारियों को दूसरी जगह काम पर लगाना पड़ा। सरकार ने बहाना बनाया गया कि ट्रेडरों की नाराजगी के चलते प्रदेश की कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया। दिलचस्प बात तो यह है कि ज्यादातर किसान, उपभोक्ता और उद्योग इस रिटेल फॉरमेट के पक्ष में थे क्योंकि इससे कृषि क्षेत्र के विकास की ढेरों संभावनाएं छिपी थी।


मुख्यमंत्री ने संगठित खुदरा नीति का स्थानीय ट्रेडरों पर असर जानने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी का गठन किया लेकिन इस मोर्चे पर अभी तक कोई नतीजा निकल कर नहीं आया है। भारतीय उद्योग परिसंघ की उत्तर प्रदेश राज्य परिषद के अध्यक्ष अमिताभ नांगिया कहते हैं कि औद्योगिक क्षेत्र को अब भी यकीन नहीं है कि सरकार पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप(पीपीपी) मॉडल को लेकर गंभीर है।


बर्फ पिघलना जरूरी है क्योंकि कई क्षेत्र हैं जैसे बुनियादी ढांचा और पर्यटन जहां इस मॉडल के जरिए ज्यादा तेजी से विकास किया जा सकता है और कहने की जरूरत नहीं है कि आर्थिक विकास और निवेश की गाड़ी को पटरी पर बनाए रखने के लिए बिजली क्षेत्र की मांगों पर ध्यान देना जरूरी है।


उत्तर प्रदेश में पनबिजली और ताप बिजली मिलाकर कुल 2700 मेगावॉट बिजली का उत्पादन हो रहा है जबकि 3000 मेगावॉट बिजली केन्द्र से ली जाती है। इसके बावजूद 8000 मेगावॉट की चरम मांग को पूरा करने के लिहाज से यह काफी कम है। इस संकट से निपटने के लिए 11 पंचवर्षीय योजना के तहत बिजली उत्पादन बढ़ाकर 10,000 मेगावॉट करने की कोशिशें की जा रही हैं।


इसके लिए नेशनल थर्मल पावर कॉरपोरेशन, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल लिमिटेड समेत निजी क्षेत्र की बड़ी कंपनियों रिलायंस और लैंको के साथ हाथ मिलाया गया है। एनटीपीसी ललितपुर में एक मेगा बिजली संयंत्र लगा रही है जबकि भेल अनपरा डी में 1000 मेगावॉट क्षमता वाला संयंत्र लगा रही है। इसके अलावा सरकार भी बारा में 1,980 मेगावॉट और कर्छना में 1,320 मेगावॉट के दो संयंत्र लगा रही है लेकिन इन सब परियोजनाओं का लाभ 2010 में मिलने की आशाएं हैं।


बिजली वितरण घाटे और बिजली चोरी के मसले यूपी पावर कॉरपोरेशन क ठघरे में है और केन्द्र से उसे लगातार फटकार मिल रही है। एसोचैम के महासचिव एस.बी. अग्रवाल कहते हैं कि राज्य में बिजली की खस्ता हालत की वजह से ही यहां कोई नया उद्योग नहीं लगाता और जो पहले से मौजूद हैं वह भी उत्तराखंड जैसे दूसरे राज्यों में जा रहे हैं। अग्रवाल ने चिंता जाहिर की कि उत्तर प्रदेश में विशेष आर्थिक क्षेत्र लगाने के नए प्रस्ताव नहीं आ रहे हैं जबकि दूसरे राज्यों में बहुत तेजी से निवेश हो रहा है।


राज्य सभा सांसद और ट्रेड लीडर बनवारी लाल कंछल ने सरकार पर दादरी बिजली परियोजना को तहस-नहस करने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस एक साल में कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में कोई विकास नहीं हुआ है जबकि पिछली सरकार ने राज्य में 35 चीनी मिलें लगाई थी। मायावती सरकार ने इस साल दूसरे राज्यों की देखादेखी, ट्रेडरों की मर्जी के खिलाफ वैट लागू कर दिया है।


उधर गन्ने के भुगतान का मामला सरकार के गले की फांस बना हुआ है। हालांकि अर्बन कोऑपरेटिव बैंकों की हालत में सुधार के लिए राज्य सरकार ने भारतीय रिजर्व के साथ एक समझौता किया है।


इसके अलावा कई महत्वपूर्ण क्षेत्र निजी कंपनियों के लिए खोल दिए गए हैं लेकिन एक जानी-मानी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी के वरिष्ठ आधिकारी का कहना है कि पिछले एक साल के दौरान राज्य में ज्यादा निवेश नहीं हुआ है। यहां उद्योगों को आकर्षित करने के लिए बहुत कुछ करने की जरूरत है क्योंकि मुकाबले में ऐसे राज्य हैं जो उन्हें ज्यादा रियायतें मुहैया करा रहे हैं।

First Published : May 14, 2008 | 12:23 AM IST