मद्रास स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स (एमएसई) के निदेशक डी. के. श्रीवास्तव इन दिनों अजीब मुश्किल से गुजर रहे हैं।
वजह यह है कि मास्टर डिग्री के उनके 50 छात्रों मे से एक भी पीएचडी करने में रुचि नहीं दिखा रहा है। ये छात्र उच्च शिक्षा की जगह बढ़िया नौकरियों को तरजीह दे रहे हैं। दरअसल, इस तरह के रुझान केवल एमएसई जैसे संस्थानों में नहीं देखने में आ रहे हैं, बल्कि देशभर के कई संस्थानों में अर्थशास्त्र में पीएचडी करने में छात्रों का रुझान कम होता जा रहा है।
यहां तक कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विकासशील मुद्दों के अध्ययन के लिए स्थापित किए गए इंदिरा गांधी इंस्टीटयूट ऑफ डेवलपमेंट रिसर्च (आईजीआईडीआर) जैसे प्रीमियर इंस्टीटयूट में भी पिछले कुछ सालों में रिसर्च करने वालों का टोटा पड़ता जा रहा है।
श्रीवास्तव कहते हैं, ‘प्रतिभावान छात्र उद्योग जगत का रुख कर रहे हैं। ऐसे में संस्थानों के सामने छात्रों को रोके रखने की चुनौती और बड़ी होती जा रही है।’ वैसे, अमर्त्य सेन और जगदीश भगवती जैसे अर्थशास्त्री भारत से जुड़े रहे हैं, लेकिन मौजूदा दौर में अर्थशास्त्र में अमेरिका और यूरोप के मुकाबले भारत में कम शोध हो रहा है।
कुछ विशेषज्ञ शोध में छात्रों की घटती रूचि के लिए तीन बातों को जिम्मेदार मानते हैं। पहला, संस्थानों में अच्छी फैकल्टी की कमी, दूसरा छात्रों को कम स्कॉलरशिप और तीसरी यह कि पीएचडी के बाद नौकरी के सीमित अवसर होना। ऐसे में जो भी छात्र पीएचडी करना चाहते हैं, वे विदेशी संस्थानों की राह पकड़ना अधिक मुनासिब समझते हैं। इस बाबत आईजीआईडीआर के निदेशक डी. एम. नचाने बताते हैं कि विदेश में भी शोध के प्रति छात्रों की रूचि कम हुई है।
ऐसे में विदेशी संस्थान अपनी सीटों को भरने के लिए भारतीय छात्रों को निशाना बना रहे हैं। वे बढ़िया स्कॉलरशिप के जरिये भारतीय छात्रों को लुभाने में लगे हैं जबकि इस मुकाबले में भारतीय संस्थान इनके सामने कहीं नहीं टिक पाते हैं। भारतीय संस्थानों में जहां 6,000 से 15,000 रुपये प्रतिमाह तक की ही स्कॉलरशिप मिल पाती है, हालांकि कुछ मैनेजमेंट इंस्टीटयूट में अपवाद के तौर पर 25,000 रुपये प्रति माह तक भी मिलते हैं जबकि विदेशी संस्थान हर महीने 800 से 1500 डॉलर प्रतिमाह तक की स्कॉलरशिप दे रहे हैं।
इस बाबत नचाने और श्रीवास्तव जैसे लोगों की यही राय है कि छात्रों को आकर्षित करने के लिए स्कॉलरशिप को बढ़ाया ही जाना चाहिए। इस मामले में एमएसई और आईजीआईडीआर जैसे संस्थान कदम बढ़ा चुक हैं, जबकि दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स (डीएसई) ने इस मामले में अपनी राय हमें नहीं दी।
मास्टर डिग्री कर चुके छात्रों को आमतौर पर वित्तीय संस्थानों और कंसल्टेंसी कंपनियों में 6 से 8 लाख रुपये सालाना की नौकरी आसानी से मिल जा रही है। इसके अलावा पाठयक्रम और फैकल्टी को लेकर भी दिक्कतें बढ़ती जा रही हैं। मिशिगन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे अर्थशास्त्री पार्थ जे. शाह बताते हैं कि देश से बाहर जाकर मैंने जो चीजें दस साल पहले ही सीख ली थीं, वही चीजें भारत में अब सिखाई जा रही हैं।
स्नातक-मास्टर डिग्री के बाद छात्रों को मिल जाती है अंतरराष्ट्रीय कंपनियों में मोटी तनख्वाह पर नौकरी
छात्रवृत्ति और संसाधनों के अभाव में शोध से दूर हो रहे छात्र