भारत में बुजुर्गों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है और अल्जाइमर का जोखिम बुजुर्ग आबादी को अधिक प्रभावित कर रहा है। भारतीय रोगियों को दिया जाने वाला उपचार उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने की कोशिश तो करता है लेकिन वास्तव में इसका न तो कोई प्रभाव पड़ता है और न ही यह बीमारी को रोकने में सफल साबित हो रहा है। चिकित्सकों का कहना है कि विदेश में खोजे गए नए उपचार का खर्च बहुत अधिक होने के कारण कम भारतीय रोगी ही उसका फायदा उठा पाते हैं।
हालांकि एक नई दवा ने अल्जाइमर रोग के खिलाफ थोड़ी उम्मीद जगाई है। अमेरिकी दिग्गज बायोजेन और जापान की इसाई ने पिछले हफ्ते अपने दवा परीक्षण का ब्योरा पेश करते हुए कहा कि उनकी दवा लेकेनमैब 18 महीनों में शुरुआती चरण की बीमारी वाले लोगों में इसके खतरे को 27 फीसदी तक कम कर सकती है।
इस दवा से लाभ तो दिखा लेकिन मस्तिष्क की सूजन और रक्तस्राव जैसे दुष्प्रभाव भी देखने को मिले। फिर भी इस दवा ने उम्मीद जगाईं है और इन दोनों कंपनियों के शेयर भाव भी 2050 तक काफी बढ़ सकते हैं क्योंकि उस समय तक लगभग 22 फीसदी आबादी बुजुर्गों की ही होगी। अल्जाइमर लगातार बढ़ने वाला विकार है, जिसमें मस्तिष्क सिकुड़ जाता है और उसकी कोशिकाएं मर जाती हैं।
ये परिणाम अमिलॉयड परिकल्पना को सही ठहराते दिखते हैं, जिस पर लंबे अरसे से बहस चल रही है। इसके अनुसार जहरीला प्रोटीन अमिलॉयड दिमाग में जमा हो जाता है और वही अल्जाइमर रोग के मुख्य कारणों में शुमार है। लेकेनमैब विषैले बीटा अमिलॉयड के जोड़ को रोकता है और खत्म करता है।
रोगियों के लिए खुशखबरी यह है कि अभी बहुत सारी अमिलॉयड रोधी दवाओं पर अध्ययन हो रहा है। उदाहरण के लिए रोश और इलाइ लिली की दवाएं परीक्षण के अंतिम चरण में हैं। मगर ये नई दवा बहुत महंगी होंगी और अधिकतर रोगियों की पहुंच से बाहर होंगी। भारत जैसे देश में इन्हें खरीद पाना और भी मुश्किल होगा क्योंकि यहां ज्यादातर लोगों को इलाज के लिए अपनी जेब से ही खर्च करना पड़ता है।
उदाहरण के तौर पर बायोजेन की अल्जाइमर दवा एडुहेल्म को पिछले साल 56,000 डॉलर प्रति वर्ष की कीमत पर लाया गया था, यानी एक साल की दवा के लिए मरीज को 56,000 डॉलर खर्च करने पड़ेंगे। इस दवा ने अमेरिका में सांसदों को भी हैरान कर दिया था। इस साल जनवरी में कंपनी ने दवा की कीमत आधी यानी 28,000 डॉलर प्रति वर्ष कर दी, जो लगभग 22 लाख रुपये सालाना बैठती है।
डॉक्टरों का कहना है कि ये दवाएं ज्यादातर मरीजों की पहुंच से बाहर हैं। गुरुग्राम स्थित फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के न्यूरोलॉजी विभाग के प्रधान निदेशक और प्रमुख डॉ प्रवीण गुप्ता ने कहा कि दवा जब पेश की गई तो बायोजेन के एडुहेल्म की कीमत लगभग 40 लाख रुपये थी। ये ओपीडी में ही इस्तेमाल होती है और बहुत कम परिवार ही इतना महंगा इलाज कराने वाला बीमा खरीद पाते हैं। फायदा ज्यादा न हो तो लोग ऐसी दवाएं लेते भी नहीं हैं।
लेकिन भारत में अल्जाइमर रोग के मामले बढ़ रहे हैं, जिसे डिमेंशिया का सबसे आम कारण माना जाता है। डिमेंशिया के कारण व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से कार्य करने की क्षमता, उसकी सोच, व्यवहार और उसके सामाजिक कौशल में लगातार नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है।
माहिम के पीडी हिंदुजा अस्पताल और एमआरसी के सलाहकार न्यूरोलॉजिस्ट और प्रमुख, डॉ पी पी अशोक ने व्यापक आंकड़े पेश करते हुए बताया कि 65 से 74 वर्ष की आयु के प्रत्येक 1,000 लोगों में हम आमतौर पर अल्जाइमर के चार नए मामले पाते हैं। और यह आंकड़ा हर दशक में बढ़ता जाता है। 75 से 84 वर्ष की आयु के 1,000 लोगों में लगभग 32 लोग अल्जाइमर से ग्रसित हैं और 85 वर्ष की आयु से ऊपर यह संख्या बढ़कर 76 प्रति हजार हो जाती है।
भारत अभी भी काफी हद तक युवा देश है और हम अब भी पश्चिमी देश की तुलना में अल्जाइमर जैसी बीमारियों के बोझ को महसूस नहीं करते हैं। पश्चिमी देशों में बड़ी आबादी बुजुर्ग है। जागरूकता की कमी और रोग के बारे में सही समय पर पता न लग पाने के कारण भी कई ऐसे मामले आते हैं, जिनका उपचार नहीं हो पाता।
डॉ. अशोक ने कहा कि लगभग 30 साल पहले हम कहा करते थे कि भारत में शायद ही कोई एन्यूरिज्म (रक्त वाहिका की दीवार में असामान्य उभार या सूजन) से पीड़ित हो। लेकिन अब यह रोग आम हो चुका है।
डॉक्टरों ने कहा कि इस बीमारी के लिए राष्ट्रीय स्तर की कोई नीति नहीं है और परिवार पर स्वास्थ्य के खर्च की बड़ी जिम्मेदारी लोगों पर उनकी युवा उम्र में है। डॉ़ अशोक कहते हैं कि पश्चिमी देशों में रोगी देखभाल कार्यक्रम और केंद्र हैं जो ऐसे रोगियों की मदद करते हैं। भारत में हम अब भी संयुक्त परिवार प्रणाली पर काफी हद तक निर्भर हैं।
संयुक्त राष्ट्र के अनुमानों के अनुसार 2050 तक भारत की आबादी का लगभग 20 फीसदी हिस्सा वरिष्ठ नागरिकों का होगा, जब पांच में से एक भारतीय की उम्र 60 वर्ष या उससे अधिक होगी। भारत में निश्चित रूप से वृद्धावस्था बढ़ रही है।
अंतरा सीनियर केयर की प्रमुख (मार्केटिंग ऐंड कम्युनिकेशंस) जसरीता धीर ने कुछ दिलचस्प आंकड़े साझा किए। इन आंकड़ों के अनुसार लगभग 2 करोड़ बुजुर्ग अब देश में अकेलेपन में रहते हैं, और यह संख्या अगले दो दशकों में बढ़ने की उम्मीद है। यह अनुमान लगाया गया है कि भारत में असिस्टेड लिविंग सर्विसेज (वृद्धाश्रम) का संभावित बाजार लगभग 1 अरब डॉलर का है। अंतरा सीनियर केयर न्यूरोलॉजिकल और उम्र बढ़ने से संबंधित स्थितियों वाले रोगियों और डिमेंशिया या अल्जाइमर और अन्य न्यूरो-संज्ञानात्मक विकारों से पीड़ित रोगियों की देखभाल करने की कोशिश कर रहा है। इसने पिछले महीने गुरुग्राम में एक मेमरी केयर होम की शुरुआत की थी।
धीर ने कहा कि जब तक वे चाहें तब तक यहां रह सकते हैं या यहां तक कि जब परिवार या देखभाल करने वाला दूर हो तो अल्पकालिक ठहरने का विकल्प भी चुन सकते हैं। केयर प्रोटोकॉल प्रत्येक रोगी की जरूरतों के अनुसार उनके अनुकूल रूप से किया जाता है। धीर कहते हैं कि लगभग 3.7 फीसदी यानी 61 लाख वरिष्ठ नागरिक डिमेंशिया से पीड़ित हैं, और यह संख्या 2050 तक तिगुनी हो सकती है।