फिर बाहर आया करार का जिन्न

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 8:00 PM IST

विवादास्पद परमाणु करार का जिन्न एक बार फिर बोतल से बाहर निकल आया है, जिससे सरकार पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।


परमाणु करार पर अमेरिका द्वारा किए गए कुछ खुलासों पर भारतीय जनता पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने फिर से आंखे तरेरनी शुरू कर दी हैं। माकपा और भाजपा ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाया और मांग की कि तत्काल संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए, जिससे उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाया जा सके।

भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा ने कहा कि अमेरिकी विदेश मंत्रालय के खुलासों ने हमारी आशंका को सही साबित कर दिया है। उन्होंने आशंका जताई कि इस समझौते से भारत परमाणु परीक्षण का अधिकार हमेशा के लिए खो देगा। सिन्हा ने कहा कि सरकार ने इस मामले पर सदन को अंधेरे में रखा। यह संसद के विशेषाधिकारों का उल्लंघन है।

प्रधानमंत्री के खिलाफ विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव लाने के लिए तुरंत संसद का सत्र बुलाने की मांग के साथ सिन्हा ने उनके इस्तीफे की भी मांग की। सरकार ने कहा-कुछ नहीं बदला परमाणु करार पर अमेरिकी रुख के रहस्योद्धाटन से यहां राजनीतिक हलकों में भूचाल आने के बाद केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा कि भारत 123 संधि से अमेरिका से बंधा है और उसमें कोई तब्दीली नहीं आई है।

सिब्बल ने परमाणु करार पर अमेरिकी विदेश मंत्रालय के पत्राचार के लीक होने के संबंध में कहा, कि पत्र 123 संधि के मुताबिक ही है और उसमें कोई बदलाव नहीं है। काकोदर बोले, फर्क नहीं पड़ता परमाणु ऊर्जा आयोग के अध्यक्ष अनिल काकोदकर ने कहा कि करार पर अमेरिका के खुलासे से भारत की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि करार में सामरिक कार्यक्रम के लिए ‘पर्याप्त संरक्षण’ है।

मसौदा एनएसजी में पेश

भारत केंद्रित प्रस्ताव पर विचार के लिए वियना में शुरू हुई परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) की बैठक में अमेरिका ने छूट को लेकर संशोधित मसौदा पेश किया। हालांकि कुछ देशों की आपत्तियों के कारण अभी इसका भविष्य अनिश्चित है।

न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रिया, आयरलैंड और स्विट्जरलैंड सहित कुछ देश संशोधित प्रारूप से भी संतुष्ट नहीं है। वे चाहते हैं कि उसमें ऐसी बातों का समावेश हो, जिससे अंतरराष्ट्रीय परमाणु अप्रसार व्यवस्था को लाभ पहुंचे। भारत ने अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं किया है, इसलिए हो सकता है कि कुछ देश चिंता जाहिर करें।

First Published : September 4, 2008 | 11:40 PM IST