अपनी सोशल इंजीनियरिंग के बल पर उत्तरप्रदेश में सत्ता हथियाने वाली मायावती सरकार का एक साल पूरा हो चुका है।
इस पूरे कार्यकाल की समग्र तस्वीर देखी जाए तो आर्थिक मोर्चे पर सरकार के लिए यह साल मिलाजुला रहा। हालांकि विकास के रास्ते पर उठाए गए कदमों के नतीजे आने में अभी वक्त लगेगा लेकिन एक बात तो साफ तौर पर नजर आ रही है कि खेती पर निर्भर यूपी की अर्थव्यवस्था बुनियादी सुविधाओं की कमी, कम उत्पादकता और उद्योगों तक पहुंच से जुड़ी समस्याओं से लगातार जूझ रही है।
साल भर पहले जब मुख्यमंत्री मायावती ने कमान संभाली तो उनके तरकश में थी सकारात्मक उपायों से लबरेज नई आर्थिक नीतियां, जिनमें निजी क्षेत्र में आरक्षण और पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप मॉडल जैसे हथियार थे। काफी उम्मीदें जगाई थी, इन बातों ने कि अब बहेगी विकास की धारा, अब होगा यूपी का कायाकल्प।
हकीकत पर नजर डालें तो कुछ प्रस्ताव और परियोजनाओं पर तो तेजी से काम हुआ है लेकिन इन्फ्रास्ट्रक्चर और बिजली जैसी सुविधाओं के मामले में प्रदेश अब भी पिछड़ा है। केवल यही नहीं यूपी के कुल औद्योगिक परिदृश्य का एक बहुत बड़ा हिस्सा छोटे और मझोले उद्योगों से मिलकर बना है लेकिन सरकार ने इन उद्योगों की भलाई के लिए कोई विशेष नीति नहीं बनाई है।
कुछ चीजें जिन पर सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है, उनमें 30,000 करोड़ रुपये वाली गंगा एक्सप्रेसवे परियोजना और लखनऊ इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (लीडा) के जमीनों का अधिग्रहण शामिल है। जहां तक गंगा एक्सप्रेसवे का सवाल है तो इसका काम जेपी ग्रुप को सौंपा जा चुका है। 1,047 किलोमीटर लंबे 8 लेन वाले गंगा एक्सप्रेसवे का निर्माण गंगा नदी के पश्चिमी किनारे के साथ ग्रेटर नोएडा से बलिया के बीच किया जा रहा है।
उधर बिजली संकट और संगठित खुदरा नीति पर छाई धुंध औद्योगिक क्षेत्र में चिंता का कारण बनी हुई है। पिछले एक साल में औद्योगिक और आर्थिक विकास पर प्रतिक्रिया मिली-जुली है। इंडियन इंडस्ट्री एसोसिएशन के कार्यकारी निदेशक डी.एस. वर्मा ने बिजनेस स्टैंडर्ड से कहा कि परियोजनाओं का कागज से जमीन पर उतरना ज्यादा मायने रखता है।
जैसे गंगा एक्सप्रेसवे का काम मायावती सरकार के विकास फार्मूला की सफलता तय करेगा। सरकार को लीडा पर बहुत तेजी से काम करने की जरूरत है। मानदंड सिर्फ यही हो सकता है कि काम समय-सीमा के भीतर पूरा कर लिया जाए। (जारी)