आज की इस डिजीटल दुनिया हर रोज टेक्नॉलॉजी में नया बदलाव आता रहता है। खासतौर पर स्मार्टफोन की बात करें तो हर दिन कुछ नया अपडेट आता रहता है। हालांकि, ये स्मार्टफोन जितना हम इंसानों के लिए जरूरतमंद हैं, उतना ही जलवायु और प्रकृति के लिए खतरा भी।
सिर्फ मोबाइल की बात करें तो आमतौर पर हम लोग नया अपडेटेड फोन लेते हैं तो पुराना वाला या तो कई दिनोंं तक अलमारी के किसी कोने में पड़ा रहता है या फिर खराब और पुराना मोबाइल कचरे के ढ़ेर में चला जाता है। ये इलेक्ट्रॉनिक कचरा भी पर्यावरण के लिए खतरनाक है।
एक रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल भी करीब 5.3 अरब मोबाइस फोन बेकार हो जाएंगे। बता दें कि इतने सारे मोबाइल फोन के कारण देश और दुनिया में कचरे के और भी ज्यादा बढ़ने की संभावना है।
आपको बता दें कि मोबाइल कंपनियां बेकार फोन से निकाले गए सोने, तांबे, चांदी, पैलेडियम जैसे मूल्यवान कम्पोनेंट्स को रीसाइकल करते हैं।
इसी वजह से विशेषज्ञों ने लोगों को चेतावनी दी है कि इस साल लगभग 5.3 बिलियन मोबाइल फोन इस्तेमाल से बाहर हो जाएंगे। बता दें कि अधिकतर डिवाइसों को कचरे में फेंक दिया जाता है.
ग्लोबल सर्वे के मुताबिक, आज औसत परिवार में तकरीबन 74 ई-प्रोडक्ट मौजूद हैं। इन डिवाइस में फोन लैपटॉप से लेकर बिजली के उपकरण, टोस्टर, हेयर ड्रायर आदि शामिल हैं।
आकड़ों के अनुसार, 2022 में दुनियाभर में उत्पादित सेल फोन, कैमरों, इलेक्ट्रिक टूथब्रश और टोस्टर जैसी छोटी वस्तुओं का अनुमानित वजन कुल 24.5 मिलियन टन होगा।
वेस्ट इलेक्ट्रिकल एंड इलेक्ट्रॉनिक इक्विपमेंट (WEEE) के अनुसार पुराने फोन का दोहन करना काफी खतरनाक होता है, जिसकी वजह से जलवायु पर भी असर पड़ता है। इसका सबसे सही तरीका ये ही है कि फोन के कीमती सामानों को रीसाइकल किया जाए। हालांकि, ऐसे बहुत ही कम लोग हैं जो अपने पुराने फोन को रीसाइकल करते हो। यही कारण है ई-वेस्ट के बढ़ने का।
रिपोर्ट के मुताबिक, ई-वेस्ट के मामले में भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा देश है। बता दें कि भारत में हर साल करीब 10 लाख इलेक्ट्रॉनिक कचरा पैदा होता है। सबसे चौकाने वाली बात तो यह कि भारत में इतना ई-वेस्ट होने के बावजूद केवल 10 फीसदी तक ही इलेक्ट्रॉनिक कचरा इकट्ठा किया जाता है।