वॉलमार्ट ने आते-आते बहुत देर कर दी…

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 2:42 AM IST

संगठित खुदरा कारोबार देश में तेजी से बढ़ रहा है। नतीजतन देशी ही नहीं विदेशी कंपनियां भी इसमे कूदने के लिए तैयार हैं लेकिन बाहरी खिलाड़ियों के लिए राहें उतनी भी आसान नहीं हैं।


साल 2006 में जब मुकेश अंबानी की अगुआई में रिलायंस ने हैदराबाद में पहला रिटेल स्टोर खोला था करीब उसी समय दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा चेन वॉलमार्ट ने भारती के साथ मिलाया। इरादा था भारतीय खुदरा बाजार में छाने का लेकिन फिलहाल यह सपना पूरा होता नहीं दिख रहा है।

साल 2008 के अंत तक भारती-वॉलमार्ट प्राइवेट लिमिटेड के स्टोर का शुभारंभ होना था लेकिन अब यह अगले साल यानी 2009 तक के लिए टल गया है जबकि रिलायंस देश भर में करीब 600 स्टोर खोल चुकी है।

इस मसले पर सफाई देते हुए भारती-वॉलमार्ट के प्रवक्ता ने कहा कि इस साल के अंत तक स्टोर खोलने का इरादा तो जरूर था लेकिन जैसे-जैसे योजना को अमली जामा पहनाने का वक्त आ रहा है हमने बाजार को समझने की कोशिशें तेज कर दी हैं और आपूर्ति से जुड़े मसलों पर गंभीरता से सोच-विचार चल रहा है।

गौरतलब है कि भारती के साथ हाथ मिलाने में वॉलमार्ट ने काफी मुस्तैदी दिखाई थी और ब्रिटिश सुपरमार्केट चेन टेस्को को पछाड़ते हुए यह समझौता कि या था। दिलचस्प बात यह है कि इस अमरीकी कंपनी ने असाधारण तेजी दिखाते हुए केवल तीन महीने के अंदर समझौते को अंतिम रूप दे दिया जबकि टेस्को और भारती के बीच एक साल से बातचीत चल रही थी।

वॉलमार्ट और भारती के बीच हुए समझौते के तहत भारती ने फ्रंट एंड संभालने का जिम्मा लिया और भारती-वॉलमार्ट नाम के संयुक्त उपक्रम की शुरुआत हुई। एक बिजनेस कंसल्टिंग फर्म के टेक्नोपैक के अध्यक्ष अरविंद के सिंघल कहते हैं कि इन अंतरराष्ट्रीय रिटेलरों को अपने कुछ बाजारों में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, जिसकी वजह से उनका ध्यान बंट गया है।

उधर वॉलमार्ट ने इस मामले में बचाव की मुद्रा अपनाते हुए कहा है कि पिछले दस सालों के दौरान वॉलमार्ट ने पहली बार भारतीय बाजार में कदम रख रहा है। शोध के जरिए बाजार की बारीकियों को समझने और समझौते को सही तरीके से लागू करने में वक्त लग गया है। हालांकि जानकारों की राय है कि देरी होने की वजह यह है कि वॉलमार्ट इस बात का पता लगाने की जुगत में थी कि क्या वह भारत में फ्रंट एंड संभाल सकती है या नहीं।

वॉलमार्ट ने यह समझौता तब किया था जब भारतीय खुदरा बाजार मल्टी ब्रांड रिटेलिंग में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की आस लगाए बैठा था और टेस्को ने इस मामले में बढ़त ले ली थी। गौरतलब है कि सरकार ने साल 2006 में सिंगल ब्रांड रिटेल स्टोर में 51 फीसदी और मल्टी ब्रांड स्टोर में कुछ सीमा तक निवेश की इजाजत दी थी हालांकि विपक्ष के भारी विरोध के चलते मल्टी ब्रांड स्टोर में विदेशी निवेश की इजाजत नहीं दी गई।

नतीजा यह हुआ कि टेस्को, कार्फू और वॉलमार्ट जैसी विदेशी कंपनियों के लिए एक ही रास्ता बचा रह गया कि वह फ्रैंचाइजी के जरिए भारतीय बाजार में प्रवेश करे लेकिन वॉलमार्ट ने भारती के साथ साझेदारी करना बेहतर विकल्प समझा। उधर भारती ने ईजी डे ब्रांड के जरिए फ्रंट एंड रिटेलिंग कारोबार में कदम रखा है लेकिन यह बिड़ला समूह और रिलायंस इंडस्ट्रीज जैसे अपने रिटेल प्रतियोगियों से पिछड़ गई लगती है।

(अगले अंक में जानिए रिटेल में कार्फू और टेस्को के प्रयासों के बारे में।)

First Published : May 30, 2008 | 12:20 AM IST