भारतीय आईटी सेवा और प्रौद्योगिकी उद्योग को रुपये में गिरावट का सबसे ज्यादा फायदा हुआ है, क्योंकि इस उद्योग की कमाई अमेरिकी डॉलर और अन्य विदेशी मुद्राओं में होती है। चूंकि इसके राजस्व में 50 प्रतिशत से अधिक का योगदान अमेरिका का होता है, इसलिए रुपये में किसी भी गिरावट से उनकी कमाई बढ़ जाती है।
यह उनके मार्जिन प्रदर्शन में भी सहायक है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये में 100 आधार अंकों की गिरावट का मतलब परिचालनगत मार्जिन में 30 आधार अंक का लाभ होता है।
हालांकि जीबीपी, यूरो, येन और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जैसी अन्य मुद्राओं की तुलना में अमेरिकी डॉलर की मजबूती का भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी सेवा उद्योग पर नकारात्मक असर पड़ता है। अमेरिका के बाद ब्रिटेन और यूरोप इस क्षेत्र के सबसे बड़े बाजार हैं।
यह असर आईटी क्षेत्र की उन कई फर्मों के मार्जिन पर नजर आया, जिन्होंने हाल ही में अपनी अप्रैल-जून तिमाही (वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही) के आंकड़ों की घोषणा की थी। उदाहरण के लिए भारतीय रुपये की तुलना में अमेरिकी डॉलर में मजबूती का असर भारत की सबसे बड़ी आईटी सेवा कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (टीसीएस) पर 30 आधार अंक का असर पड़ा है। लेकिन यह मार्जिन पर बड़ा सकारात्मक प्रभाव नहीं देख पाई, क्योंकि अन्य मुद्राओं के मुकाबले डॉलर मजबूत हुआ और आपूर्ति पक्ष के दबाव ने लाभ कम कर दिया। टीसीएस के मुख्य वित्त अधिकारी समीर सेकसरिया कंपनी परिणाम के बाद कहा कि विभिन्न मुद्राओं में उतार-चढ़ाव और अन्य मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने से ज्यादा लाभ तो नहीं हुआ, लेकिन कुल मिलाकर इसका असर 30 सकारात्मक आधार अंक रहा।
माइंडट्री के मुख्य वित्त अधिकारी विनीत तेरेदेसाई ने इस बात से सहमति जताई कि हालांकि जीबीपी और यूरो के मुकाबले डॉलर के मजबूत होने से राजस्व पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है, लेकिन रुपये के मुकाबले डॉलर के मजबूत होने से कंपनी के एबिटा को फायदा पहुंचा है। उन्होंने कहा ‘अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया का 80 के स्तर पर पहुंचना अल्पावधि में सकारात्मक मार्जिन लग सकता है, लेकिन इस बात को समझना चाहिए कि इससे मुद्रास्फीति आएगी, जो मध्यम से लेकर दीर्घावधि के लिए अच्छी नहीं है। यह अनुमान लगाना मुश्किल है कि भारतीय रुपया स्थिर होगा, लेकिन आने वाले महीनों में अस्थिरता कम होने की उम्मीद है, बशर्ते कोई बड़ी भू-राजनीतिक या विस्तृत आर्थिक घटना नहीं होती।’
हालांकि सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों का सभी प्रमुख जी5 मुद्राओं से संपर्क है, लेकिन उनका अधिकांश संपर्क अमेरिकी डॉलर/भारतीय रुपये में रहता है। ईवाई के साझेदार और प्रमुख (कॉरपोरेट ट्रेजरी) हेमल शाह बताते हैं कि आईटी कंपनियों के पास एक व्यवस्थित हेजिंग प्रोग्राम है। शाह ने कहा कि आईटी कंपनियों ने इन सभी मुद्रा जोड़ों के लिए प्राप्ति लक्ष्य निर्धारित किए हुए हैं और इस तरह इन जोड़ों में अस्थिरता को देखते हुए अपना हेज अनुपात व्यवस्थित करेंगी। हालांकि अगर कंपनियों के कारोबार का एक बड़ा हिस्सा भारत से आता है या अन्य मुद्राओं में राजस्व आता है, तो रुपये में गिरावट अच्छी खबर नहीं है। लार्सन ऐंड टुब्रो इन्फोटेक (एलटीआई) का ही मामला ले लीजिए, जिसने कहा था कि यूरो के मुकाबले अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने से इसका मुद्रा राजस्व प्रभावित हुआ है।