न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के नियमों के अनुपालन के लिए शुरू की गई इस व्यवस्था को ब्लॉक डील के मुकाबले बढ़त मिल सकती है
बाजार नियामक सेबी की रियायत से ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) की व्यवस्था को मजबूती मिल सकती है, जिसके तहत प्रवर्तकों व अन्य बड़े शेयरधारकों को अपनी इक्विटी हिस्सेदारी बेचने की इजाजत है।
उद्योग के प्रतिभागियों ने कहा कि ओएफएस अब ब्लॉक डील की व्यवस्था का मजबूत विकल्प बनकर उभर सकता है क्योंकि कीमत के लिहाज से ओएफएस काफी लचीलेपन की पेशकश करता है।
अभी ओएफएस का इस्तेमाल सीमित है क्योंकि मौजूदा नियम के तहत सिर्फ प्रवर्तकों व 10 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी वाले निवेशकों को ही इस व्यवस्था का इस्तेमाल करने की इजाजत है। हालांकि पिछले हफ्ते सेबी ने इस ढांचे में अहम बदलाव की घोषणा की है।
अब कोई भी शेयरधारक 25 करोड़ रुपये से ज्यादा शेयर बेचने के लिए ओएफएस का इस्तेमाल कर सकता है। इसके अलावा दो ओएफएस के बीच की अवधि भी घटाकर दो हफ्ते कर दी गई है, जो अभी 12 हफ्ते है। इससे कंपनियों को नकदी के दबाव से उबरने की खातिर एक यो दो चरणों में शेयर बेचने में मदद मिलेगी।
बाजार नियामक जब इन नियमों को अधिसूचित कर देगा तब कई प्राइवेट इक्विटी कंपनियां या बड़े निवेशक ओएफएस ढांचे की परख कर सकते हैं। उद्योग के प्रतिभागियों ने ये बातें कही।
एक निवेश बैंकर ने कहा, ब्लॉक डील की व्यवस्था में मुख्य अवरोध कीमत का है। कोई विक्रेता मौजूदा बाजार कीमत पर बहुत ज्यादा छूट की पेशकश नहीं कर सकता। इसके परिणामस्वरूप इसके जरिए बड़ी शेयर बिक्री चुनौतीपूर्ण बन जाती है, खास तौर से उतारचढ़ाव भरे बाजार के माहौल में। ओएफएस का संशोधित ढांचा शानदार दिख रहा है और इसे काफी ज्यादा निवेशक अपनाएंगे।
ओएफएस की शुरुआत कंपनियों को न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता के नियमों के अनुपालन के लिए की गई थी। कोई ओएफएस दो दिन में अंजाम दिया जाता है। पहले दिन संस्थागत निवेशक बोली लगा सकते हैं जबकि दूसरा दिन खुदरा निवेशकों के लिए होता है, जिनके लिए मोटे तौर पर 10 फीसदी आरक्षण होता है।
विक्रेता को ओएफएस के लिए फ्लोर प्राइस तय करना होता है और बोलीदाताओं को इसके ऊपर किसी भी कीमत पर बोली लगाने की इजाजत होती है। ओएफएस के लिए बोली प्रक्रिया द्वितीयक बाजार प्लेटफॉर्म से अलग होती है।
दूसरी ओर ब्लॉक डील के तहत ट्रेड से पहले निजी तौर पर बातचीत होती है। चूंकि ये एक्सचेंज के प्लेटफॉर्म पर होते हैं, ऐसे में कभी-कभार खरीदार हिस्सेदारी ले लेते हैं जबकि जिस पक्षकार से पहले ही बातचीत हुई होती है उन्हें मदद नहीं मिल पाती। निवेश बैंकरों व एफपीआई ने सेबी के सामने मुख्य रूप से ये चीजें रखी थी।
सेबी की चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच ने कहा, ब्लॉक डील के तहत कीमत पर पाबंदी होती है, जो बाजार कीमत के एक फीसदी ऊपर या नीचे हो सकता है। ओएफएस उस कीमत पर होता है जो आप चाहते हैं और यह बाजार में खुला होता है। ऐसे में इसमें ज्यादा लचीलापन है। अगर कंपनियां इस मार्ग के इस्तेमाल की इच्छुक हैं तो हम उनका स्वागत करेंगे।
हाल के महीनों में कुछ बड़े लेनदेन ब्लॉक डील के जरिए हुए हैं और ये हैं पीई दिग्गज ब्लैकस्टोन समूह की तरफ से एम्बेसी ऑफिस रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट की 8 फीसदी हिस्सेदारी बिक्री, पीई दिग्गज केकेआर की तरफ से मैक्स हेल्थ की पूरी 27 फीसदी हिस्सेदारी बिक्री, उबर की तरफ से जोमैटो की पूरी 7.8 फीसदी हिस्सेदारी बिक्री और अबरदीन की तरफ से एचडीएफसी म्युचुअल फंड की 5.6 फीसदी हिस्सेदारी बिक्री।
अभी ओएफएस के जरिए जुटाई गई रकम ब्लॉक डील के जरिए जुटाई गई रकम का मामूली हिस्सा भर है। 2022 के पहले नौ महीने में 2 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा लेनदेन ब्लॉक डील के जरिए हुए हैं। इसकी तुलना में ओएफएस के जरिए महज 4,463 करोड़ रुपये जुटाए गए हैं।
उद्योग के प्रतिभागियों का मानना है कि बड़े और अच्छी तरह से नियोजित सौदे ब्लॉक डील से ओएफएस की ओर जा सकते हैं।