सर्वोच्च न्यायालय ने 30 सितंबर के आदेश में कहा है कि दिवालिया संहिता के तहत किसी अन्य इकाई की तरफ से अधिग्रहण के बाद दिवालिया फर्मों के प्रवर्तक कंपनी में बाकी हिस्सेदारी बनाए नहीं रख सकते। न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी के पीठ ने शुक्रवार को भूषण स्टील के प्रवर्तकों नीरज सिंघल व अन्य की अपील खारिज कर दी। पीठ ने इस मामले में एनसीएलटी व एनसीएलएटी के आदेश पर सहमति जताई और अलग आदेश जारी करने का कोई कारण नहीं नजर आया।
दिवालिया संहिता के तहत समाधान प्रक्रिया के जरिये टाटा स्टील की तरफ से कंपनी की 72.65 फीसदी के अधिग्रहण के बाद भी प्रवर्तकों के पास 2.35 फीसदी हिस्सेदारी बरकरार थी।
अदालत के आदेश में कहा गया है, अपील करने वाले कंपनी के पूर्व प्रवर्तक हैं, इसलिए वे कंपनी में किसी भी तरह से हिस्सेदारी बरकरार नहीं रख सकते, जैसा कि एनसीएलएटी ने भी कहा है।
साल 2017 में भूषण स्टील के ऊपर लेनदारों का 56,000 करोड़ रुपये बकाया था। उसी साल आरबीआई ने 12 बड़े डिफॉल्टरों में से एक के तहत इस कंपनी की पहचान की थी, जिसे दिवालिया प्रक्रिया से गुजरना था।
15 मई, 2018 को एनसीएलटी ने भूषण स्टील के लिए टाटा स्टील की बोली को मंजूरी दी। हालांकि भूषण स्टील के प्रवर्तकों ने एनसीएलएटी में टाटा स्टील की बोली को चुनौती दी।
समाधान योजना के तहत टाटा स्टील को भूषण स्टील का अधिग्रहण 35,200 करोड़ रुपये में करना था। साथ ही लेनदारों को अगले 12 महीने तक 1,200 करोड़ रुपये देने थे जबकि बैंकों के बाकी कर्ज को इक्विटी में बदलना था। भूषण स्टील के प्रवर्तकों ने आरोप लगाया था कि टाटा स्टील बोली की पात्र नहीं है क्योंकि उसकी सहायक ब्रिटेन में मुकदमे का सामना कर रही है।