बाजार नियामक सेबी ने रेटिंग के सख्त कदम से जुड़े ढांचे में बदलाव किया है और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के साथ सहयोग नहीं करने वाली कंपनियों से निपटने वाली नीति को भी बेहतर बना दिया है।
रेटिंग में सख्ती का सामान्य मतलब यह है कि जब किसी कंपनी (इश्यू करने वाली) की क्रेडिट रेटिंग अल्पावधि में डाउनग्रेड कर दी जाती है। यह बार-बार निवेशकों को अंधेरे में रखता है या उन्हें इस पर प्रतिक्रिया जताने के लिए काफी कम समय देता है।
सहयोग नहीं करने वाली कंपनियां वे होती हैं जो रेटिंग एजेंसियों को पर्याप्त व समयबद्ध सूचनाएं नहीं देती हैं, जिससे रेटिंग एजेंसियों को उनकी परिसंपत्तियों की निगरानी व रेटिंग में चुनौतियों का सामना करना होता है।
सेबी ने एक परिपत्र में कहा है, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को रेटिंग के सख्त कदम का खुलासा करना होगा अगर रेटिंग की लगातार दो गतिविधियों के बीच रेटिंग में बदलाव तीन या तीन से ज्यादा पायदान नीचे किया गया हो। दूसरे शब्दों में लगातार जारी हुए दो प्रेस विज्ञप्ति में क्रेडिट रेटिंग का अंतर तीन या तीन ज्यादा पायदान नीचे का हो तो रेटिंग के सख्त कदमों को खुलासे में शामिल करना होगा।
ये कदम एमटेक ऑटो व आईएलऐंडएफएस के मामले में रेटिंग के सख्त कदमों के उदाहरण के बाद उठाए गए हैं, जिसने निवेशकों को परेशान कर दिया था। उदाहरण के लिए साल 2018 में आईएलऐंडएफएस की तरफ से जारी ऋणपत्र की रेटिंग एएए से डी कर दी गई थी और वह भी छह महीने से कम अवधि में।
मोटे तौर पर रेटिंग के सख्त कदम उन कंपनियों के मामले में देखने को मिलते हैं जिनकी वित्तीय स्थिति चरमरा रही होती है। क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां कंपनियों की वित्तीय सेहत पर लगातार नजर रखती हैं, जिसके लिए वह सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सूचनाओं पर निर्भर करती है और बैंकों व कंपनियों से सूचनाएं मांगती भी है।
सेबी ने क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को अलग से सख्त रेटिंग के कदमों का खुलासा करने का निर्देश दिया है, जिसमें कंपनियों की तरफ से सूचनाएं मुहैया कराने में असहयोग शामिल है।
साल 2016 में सेबी ने सहयोग न करने वाली कंपनियों के मामले में एक नीति बनाई थी। नियामक ने अब कहा है, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के पास इस संबंध में विस्तृत नीति होनी चाङिए, जिसमें निम्न चीजें शामिल हों। 1. जरूरी सूचनाएं जमा न कराना जिसमें तय समयसीमा के भीतर तिमाही नतीजे या अंकेक्षित नतीजे जमा न कराना शामिल है। साथ ही इसमें मौजूदा व पिछले परिचालन की विस्तृत जानकारी होनी चाहिए, जिसमें पूंजीगत खर्च की योजना शामिल है। 3. कर्ज से जुड़े दायित्व व पुनर्भुगतान की विस्तृत सूचना। 4. अन्य मसले जिसे क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां अपनी आंतरिक नीति आदि के लिहाज से जरूरी मानती हों।
सेबी ने कहा है कि क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को लगातार तीन महीने तक नो डिफॉल्ट की सूचना जमा न कराए जाने के मामले में एकसमान नीति का पालन करना चाहिए, जिससे क्रेडिट रेटिंग में बदलाव का आधार बनता हो।
परिपत्र में कहा गया है, क्रेडिट रेटिंग एजेंसियां लगातार तीन महीने तक एनडीएस की प्राप्ति न होने से पहले अपनी रेटिंग असहयोग वाली श्रेणी की ओर ले जा सकती हैं।
सेबी ने स्पष्ट किया है कि क्रेडिट रेटिंग की वापसी के समय क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को अपनी प्रेस विज्ञप्ति में उस प्रतिभूति पर क्रेडिट रेटिंग देनी होगी। यह नियम वहां लागू नहीं होगा जहां एजेंसी की तरफ से रेटिंग की गई प्रतिभूति पर किसी तरह की बकाया देनदारी नहीं है या कंपनी बंद हो चुकी है या किसी अन्य कंपनी के साथ उसका विलय हो गया है।
नए ढांचे सहजता से लागू हो जाएं, इसके लिए बाजार नियामक सेबी ने अलग-अलग तारीख सामने रखी है।