म्युचुअल फंड (एमएफ) उद्योग में कर्मचारियों के लिए सख्त नियमों के बीच कुछ फंड हाउस कर्मचारियों को नौकरी पर रखने के भंवर में फंस गए हैं। सीधे तौर पर असर डालने वाले नियमों के कारण वेतन में सुधार के लिए नए कर्मचारियों द्वारा मानक बढ़ोतरी से अधिक मुआवजे की मांग किए जाने से ऐसा हुआ है। चार फंड हाउस के वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बात की पुष्टि की है।
हाल के वर्षों में भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनियों (एएमसी) के संबंध में अनुपालन और खुलासा नियमों को सख्त किया है, जिसमें कर्मचारियों को भी शामिल किया गय है। साथ ही साथ बाजार नियामक ने उद्योग को निवेश लागत कम करने के लिए प्रेरित किया है।
इन नियमों के तहत सेबी ने पिछले साल यह अनिवार्य किया था कि वरिष्ठ कर्मचारियों के वेतन का 20 प्रतिशत भाग उन फंडों की एमएफ यूनिटों के रूप में भुगतान किया जाना जाए, जिनका वे प्रबंधन करती हैं। कनिष्ठ कर्मचारियों और 35 वर्ष से कम आयु वाले लोगों के मामले में यह हिस्सा 10 प्रतिशत निर्धारित किया गया है। कुछ लोगों का मानना है कि ये कड़े नियम कर्मचारियों के व्यक्तिगत फोलियो को प्रभावित कर रहे हैं।
इसके अलावा अधिकारियों ने यह भी पाया है कि कई फंड हाउस इस नियामकीय और अनुपालन बोझ से नाखुश हैं, जिसकी वजह से कानूनी तौर पर अधिक श्रमबल रखना पड़ता है।
इन अधिकारियों में से एक ने कहा कि हाल के समय में फंड हाउसों को अपने कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी पड़ी है। इसका एक बड़ा हिस्सा स्टीवर्डशिप कोड जैसे अनुपालन के लिए रहा है। हमें यह देखना होगा कि ये मानदंड कितने प्रभावी होंगे, खास तौर पर वे मानदंड जो कंपनियों को अधिक कर्मचारी नियुक्त करने के लिए मजबूर करते हैं। हमें अगले तीन से चार साल में पता चल जाएगा कि क्या यह अनुपालन संबंधी बोझ है या निवेशकों को होने वाला वास्तविक लाभ है।
स्वतंत्र विशेषज्ञों का मानना है कि कड़े नियम अल्पावधि में किसी कड़वी दवा की तरह हैं, जिनसे उद्योग के लिए प्रशासनिक मानकों में सुधार होगा और इनसे अधिक निवेशकों को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।