भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) नई पीढ़ी की कंपनियों यानी स्टार्टअप के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के लिए अधिक खुलासे जरूरी कर सकता है। साथ ही वह म्युचुअल फंड (एमएफ) यूनिट की खरीद-बिक्री को सख्त भेदिया कारोबार नियमन के दायरे में ला सकता है। सेबी के निदेशक मंडल की 30 सितंबर को होने वाली बैठक में इस सिलसिले में निर्णय लिया जा सकता है।
सूत्रों ने कहा कि नियामक पूंजी और खुलासा आवश्यकता (आईसीडीआर) नियमन में संशोधन के लिए बोर्ड की मंजूरी ले सकता है ताकि कंपनियों के लिए यह
बताना अनिवार्य कर दिया जाए कि आईपीओ की कीमत कैसे तय की गई है, मूल्य निर्धारण और आईपीओ पूर्व शेयर बिक्री कैसी हो और आईपीओ से पहले निवेशकों के सामने क्या प्रस्तुति दी गई है।
पीई गुणक, प्रति शेयर आय और रिटर्न अनुपात जैसे पारंपरिक मानदंड नई पीढ़ी की कंपनियों पर लागू नहीं हो सकते हैं क्योंकि ज्यादातर स्टार्टअप फर्म घाटे में होती हैं।
एक सूत्र के अनुसार नियामक प्रयास कर रहा है कि ऐसी कंपनियों से आईपीओ दस्तावेज में प्रदर्शन के महत्त्वपूर्ण संकेतक और ज्यादा पूरक जानकारी अनिवार्य तौर पर मांगी जाए ताकि निवेशक ज्यादा समझकर निर्णय ले सकें। जोमैटो, पेटीएम और पॉलिसीबाजार जैसी नई पीढ़ी की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट के बाद बाजार नियामक को आलोचना का भी सामना करना पड़ा है।
हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान सेबी की चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच ने अपना रुख दोहराते हुए कहा था कि नियामक का मकसद आईपीओ के मूल्य निर्धारण में हस्तक्षेप करने का नहीं है। हालांकि उन्होंने ज्यादा खुलासे और पारदर्शिता पर जोर दिया। बुच ने कहा, ‘आपको जो सही लगे, अपने निर्गम की वह कीमत आप रख सकते हैं। कोई कंपनी अगर आईपीओ से 6 महीने पहले किसी को 100 रुपये के भाव पर शेयर देती है और बाजार में 450 रुपये के भाव पर निर्गम लाती है तो हम कुछ नहीं कहेंगे। मगर हम उम्मीद करते हैं कि वह निवेशकों को बताए कि शेयर के भाव में इतना अंतर किस वजह से हुआ है।’ सूत्रों ने कहा कि सेबी घाटे वाली फर्मों के लिए कुछ बातें अनिवार्य कर सकता है। इनमें आईपीओ से पहले निवेशकों को प्रदर्शन के जरूरी और महत्त्वपूर्ण संकेतकों की जानकारी देना तथा निर्गम मूल्य पर उनके असर के बारे में विस्तृत जानकारी देना शामिल है। इस बीच सेबी बोर्ड म्युचुअल फंड यूनिट को प्रतिभूति की परिभाषा में शामिल करने की अनुमति दे सकता है ताकि इसे भेदिया कारोबार निषेध नियमन के दायरे में लाया जा सके।