भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने आरंभिक सार्वजनिक निर्गम (आईपीओ) के लिए खुलासा जरूरतों को कड़ा करने सहित विभिन्न नियमनों में बदलावों को मंजूरी दे दी है। नियामक के इस कदम का मकसद पारदर्शिता लाना और निर्गम मूल्य को वाजिब बनाना है। इसके साथ ही सेबी के निदेशक मंडल ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के विनिवेश के संबंध में ऑफर फॉर सेल (ओएफएस) के लिए नियमों में ढील देने का भी निर्णय किया। इसके साथ ही म्युचुअल फंड यूनिटों की खरीद-फरोख्त को भेदिया कारोबार नियमों के तहत लाने के प्रस्ताव को भी मंजूरी दी है।
पुरानी व्यवस्था के तहत आईपीओ लाने वाली कंपनियां प्रमुख प्रदर्शन संकेतकों का खुलासा करती हैं जो आमतौर पर वित्तीय ब्योरे में शामिल नहीं होता है। इसके साथ ही निर्गम जारी करने वाली कंपनियों को आईपीओ से पहले बेचे गए शेयरों के मूल्य निर्धारण के विवरण की भी जानकारी देनी होगी। सेबी की चेयरपर्सन माधवी पुरी बुच ने कहा कि नए नियमों से निवेशकों को अपना निर्णय लेने में सहूलियत होगी। शुरुआत में नए खुलासा नियम स्टार्टअप और घाटे वाली कंपनियों को ध्यान में रखते हुए तैयार किए गए थे लेकिन बुच ने कहा कि ये नियम सभी आईपीओ पर लागू होंगे। सख्त नियम से घरेलू बाजार में सूचीबद्धता को लेकर कंपनियों में उत्साह कम होने के बारे में पूछे जाने पर सेबी चेयरपर्सन ने कहा कि विदेशी बाजार में नियमन और भी ज्यादा सख्त हैं।
सूचीबद्ध कंपनियों के मामले में म्युचुअल फंड के प्रमुख प्रबंधन में शामिल व्यक्ति भेदिया कारोबार निषेध नियमन के दायरे में आएगा। बुच ने कहा कि म्युचुअल फंडों के लेनदेन को पहले ही इसके दायरे में लाया जा चुका है लेकिन अब इसका दायरा बढ़ाया जा रहा है। सेबी भेदिया कारोबार निषेध नियमन में म्युचुअल फंड पर एक अध्याय शामिल करेगा।
अमेरिकी बाजार की तर्ज पर सेबी ने आईपीओ पूर्व दस्तावेज को गोपनीय तरीके से जमा कराने की भी मंजूरी दी है। इसके तहत आईपीओ लाने जा रही कंपनियों की गोपनीय और संवेदनशील जानकारियों को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।
बुच ने कहा कि सेबी के निदेशक मंडल द्वारा लिए गए कई निर्णय पूंजी बाजार को बढ़ावा देने और उदारीकृत बनाने के मकसद से किया गया है। इसी तरह का एक निर्णय नकद इक्विटी और डेरिवेटिव सेगमेंट के बीच शुद्ध निपटान की अनुमति देना है। बुच ने कहा कि इससे निवेशक अपने मार्जिन का सभी सेगमेंट में इस्तेमाल कर सकेंगे।
सेबी के निदेशक मंडल ने कंपनी के बोर्ड में स्वतंत्र निदेशकों को नियुक्त करने और उन्हें हटाए जाने के लिए भी नई व्यवस्था का प्रस्ताव किया है। वर्तमान में विशेष प्रस्ताव पर 75 फीसदी पक्ष में मत मिलने से ही स्वतंत्र निदेशक को कंपनी के बोर्ड में नियुक्त किया या हटाया जा सकता है। नए नियम के तहत कंपनियां बहुमत के आधार पर ऐसा कर सकेंगी।
सेबी ने ओएफएस नियमों में भी ढील दी है। वर्तमान में 10 फीसदी से कम हिस्सेदारी वाले गैर-प्रवर्तकों को ओएफएस का उपयोग करने की अनुमति नहीं है। लेकिन नए नियम से वे ओएफएस में 25 करोड़ रुपये से कम मूल्य के शेयर भी बिक्री के लिए रख सकते हैं।