विश्लेषकों का कहना है कि भले ही बाजारों ने करीब 9 प्रतिशत की गिरावट के साथ कैलेंडर वर्ष 2022 की पहली छमाही पूरी कर ली है, लेकिन वैश्विक केंद्रीय बैंकों द्वारा ब्याज दर वृद्धि के साथ साथ मुद्रास्फीति नियंत्रण और वृद्धि को लेकर की चुनौतियां उन मुख्य कारकों में शामिल होंगी जो भविष्य में बाजार की दिशा तय कर सकती हैं।
आइए जानते हैं कि कौन से कारक अगले 6 महीनों के दौरान बाजारों की चाल प्रभावित करेंगे।
ब्याज दर
इस साल कमजोर इक्विटी का मुख्य वाहक वैश्विक रूप से ब्याज दर वृद्धि की आक्रामक रफ्तार रही है, क्योंकि रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से मुद्रास्फीति रिकॉर्ड ऊंचे स्तरों पर पहुंच गई। अमेरिकी फेडरल ने दरों में 75 आधार अंक तक का इजाफा किया, जो 28 साल में सर्वाधिक है। इसके अलावा इस साल के अंत तक ब्याज दरों में और अधिक वृद्धि का अनुमान जताया गया है। फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष जेरोम पॉवेल ने मुद्रास्फीति पर काबू पाने की दिशा में केंद्रीय बैंक की सख्ती की पुन: पुष्टि की है, भले ही इससे कुछ हद तक आर्थिक मंदी की समस्या पैदा हो जाए। रेलिगेयर ब्रोकिंग में फंडामेंटल एनालिस्ट रोहित खत्री ने कहा, ‘मुद्रास्फीति नियंत्रण पर बढ़ती कोशिश के साथ केंद्रीय बैंक ब्याज दरें बढ़ाने पर और ज्यादा आक्रामकता दिखा सकते हैं जो इक्विटी बाजारों के लिए अच्छा संकेत नहीं है।’
मुद्रास्फीति
जहां अमेरिका में खुदरा महंगाई 41 साल के ऊंचे स्तर पर पहुंच गई है, वहीं उपभोक्ता कीमत सूचकांक पूरे कैलेंडर वर्ष 2022 में आरबीआई के 6 प्रतिशत के ऊपरी दायरे पर बना रहा। इसके अलावा, केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट कर दिया कि यह दायरा वित्त वर्ष 2023 की पहली तीन तिमाहियों के दौरान बना रहेगा।
आनंद राठी में फंडामेंटल रिसर्च के प्रमुख नरेंद्र सोलंकी ने कहा, ‘निवेशकों को इस पर ध्यान देना होगा कि किस तरह से वृद्धि और मुद्रास्फीति परिवेश वैश्विक और घरेलू तौर पर विकसित हो रहा है, क्योंकि अस्थिर बना हुआ है औरअभी काफी हद तक अस्पष्ट है।’
मंदी की आशंका
भारत के मुकाबले ज्यादा प्रभावित हुए अमेरिकी में इक्विटी बाजारों में मंदी का जोखिम अधिक गहरा गया है, क्योंकि वहां फेडरल रिजर्व मुद्रास्फीति नियंत्रण पर ज्यादा सख्ती दिखा रहा है। हालांकि आनंद राठी के सोलंकी का मानना है कि अमेरिका में मंदी का भारत समेत वैश्विक वित्तीय बाजारों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, लेकिन बुरा समय काफी हद तक बीत चुका है। उनका कहना है कि मुद्रास्फीति वित्त वर्ष 2023 की दूसरी छमाही में चरम पर रह सकती है, लेकिन भारतीय बाजारों के लिए रिस्क-रिवार्ड मापक मौजूदा समय में अनुकूल है।
एफआईआई की निकासी
विदेशी निवेशकों ने इस साल अब तक भारतीय बाजारों से 2.17 लाख करोड़ रुपये की बिकवाली की है, जिससे भी बाजार पर दबाव बढ़ा है। हालांकि विश्लेषक मान रहे हैं कि ये विदेशी निवेशक ब्याज दरें स्थिर होने और मुद्रास्फीति नियंत्रित होने पर भारत की ओर फिर से ध्यान बढ़ाएंगे। एक स्थानीय ब्रोकरेज फर्म के विश्लेषक ने कहा, ‘दीर्घावधि के नजरिये से, प्राथमिक बाजार में एफआईआई निवेश की भागीदारी बढ़ रही है, जिससे पता चलता है कि देश की दीर्घावधि सफलता में उनका भरोसा बना हुआ है।’
कॉरपोरेट आय
विश्लेषकों का कहना है कि चूंकि कंपनियों ने मौजूदा तिमाही में अपने मुनाफे में धीमी दर से वृद्धि दर्ज की और धातु तथा एफएमसीजी जैसे कुछ क्षेत्रों के मार्जिन पर ज्यादा दबाव पड़ा, वहीं मुद्रास्फीति ऊंचे स्तरों पर बने रहने से मुनाफे पर दबाव बने रहने की आशंका है। हालांकि लागत वृद्धि के मोर्चे पर हालात सामान्य होने कीी स्थिति में राजस्व वृद्धि में सुधार देखा जा सकता है।