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मुश्किलों भरे दौर में उम्मीद की डोर

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 07, 2022 | 5:01 AM IST

भारतीय बाजार अब टूटता हुआ दिखाई दे रहा है और बाजार का प्रदर्शन (2008 के दौरान अभी तक) एशिया में सबसे खराब रहा है।


एनएसई का निफ्टी 4,500 अंक के आसपास झूल रहा है और जनवरी के निचले स्तर के टूटने का खतरा भी मंडराने लगा है। डॉलर की मद में बात करें तो पिछले 6 महीनों के दौरान बाजार में करीब 35 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की जा चुकी है।

अनुमान लगाया जा रहा है कि गिरावट और निराशा के दौर में मंदड़िये निफ्टी को 4,000 के स्तर तक ला सकते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में जारी तेजी पर सवाल उठाने वाले लेखों को सभी ने पढ़ा होगा और विदेशी निवेशक बिकवाली करते हुए दिख रहे हैं।

लेकिन पहले जानते हैं कि हम यहां तक पहुंचे कैसे? स्पष्ट तौर पर बाजार और कंपनियों के बीच जनवरी 2008 से पहले कुछ हद तक अत्याधिक आत्मविश्वास और उन्माद जैसी स्थिति थी। हम शेयर कीमतों, आईपीओ के  कीमत निर्धारण और फंडों के प्रवाह के आधार पर इस बात के संकेत स्पष्ट तौर से देख सकते हैं। भारतीय बाजार में 10 से 15 प्रतिशत तक के सामान्य सुधार की कल्पना कोई भी कर सकता था, हालांकि बाजार में हालात थोड़े ज्यादा खराब हैं।

किसी ने भी उम्मीद नहीं की थी कि कच्चे तेल की कीमत 125 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक चढ़ जाएगी और तेल के इस स्तर पर पहुंचने से भारत का चालू खाता (3 से 3.5 प्रतिशत) और राजकोषीय स्थिति (संचयी घाटा 9 प्रतिशत से अधिक) डांवाडोल होने लगेगी। इस दौरान महंगाई ने भी तेजी से अपना सिर उठाया है। इन हालात में नीति निर्माताओं के पास विकास की रफ्तार को पटरी पर लाने के लिए ब्याज दरों में कटौती की कोई गुंजाइश नहीं बची है।

इन व्यापक चिंताओं को चुनाव की तैयारी कर रही सरकार ने और जटिल बना दिया है। सरकार के पास सुधारों को लागू करने या सब्सिडी में कटौती करने की कोई राजनीतिक गुंजाइश नहीं बची है। इसी कड़ी में 70,000 करोड़ रुपये कर्ज के माफी पैकेज और छठे वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने जैसी घोषणाएं की जा चुकी हैं।

ठीक इसी समय में खाद्य, उर्वरक और तेल सब्सिडी में आशातीत बढ़ोतरी देखने को मिली है। पिछले पांच वर्षो के दौरान कर संग्रह में उम्मीद से अधिक बढ़ोतरी होने के बावजूद हम राजकोषीय टाइम-बम को तैयार होते हुए देख रहे हैं। कठिन संघर्ष से हासिल की गई सभी वित्तीय बढ़त जोखिम में पड़ती हुई दिखाई दे रही है और ब्याज दरों में फिर तेजी का दौर शुरू हो सकता है।

भारत की बेहतरीन कामयाबी की कहानी बदहाली की कहानी बन सकती है। खास तौर से निवेशक इस तथ्य से अवगत हुए हैं कि हम दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक हैं और बाजार को चलाने के लिए दोनों बड़े घाटे (वित्तीय और चालू खाता) जरूरी हैं और इसे कायम रखने के लिए हमें वित्तीय प्रवाह की जरूरत है। रुपये के पलटी मारने से निवेशकों की चिंताएं बढ़ी हैं।

रिजर्व बैंक द्वारा पूंजी प्रवाह पर नियंत्रण के लिए पी-नोट्स पर रोक लगाई गई और पिछले दो महीनों के दौरान मुद्रा की कीमत में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट देखने को मिली है। कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का हमारे ऊपर सबसे बुरा असर पड़ा है। ज्यादातर लोगों का मानना है कि तेल अब एक नए प्राइज जोन में प्रवेश कर चुका है।

महंगाई पर नियंत्रण के लिए विकास की आहुति देने और लघु उद्योगों के स्तर पर कीमत निर्धारण और लाभप्रदता के फैसलों में हस्तक्षेप करने की सरकारी इच्छा के कारण निवेशकों में यह धारणा बन गई है कि उन्हें अपनी आय का अप्रत्याशित हिस्सा देना पड़ सकता है। यहां तक कि हमने छोटी कंपनियों के स्तर पर भी मार्जिन का दबाव और विकास की उम्मीदों को पूरा करने में कठिनाइयों को देखा है। इस कारण चुनौतियां भी बढ़ी हैं।

हालांकि क्या सब कुछ एकदम विपरीत ही है, जैसा कि आज दिखाई दे रहा है? सच पूछिए तो 2008 जैसे साल में भी अर्थव्यवस्था 7 से 7.5 प्रतिशत की दर से विकास करेगी और कारपोरेट आय में 10 से 15 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी होने की उम्मीद है। तुलनात्मक रूप से देखें तो यह भी बेहतरीन प्रदर्शन है। दुनिया के कई देशों में इस दौरान शून्य विकास दर या नकारात्मक विकास दर का अनुमान है।
जनसांख्यिकीय, बचत और निवेश की बढ़ती दर और कारपोरेट भारत में उद्यमशीलता की भावना अभी भी बलवती है। ये कारण लंबे समय तक बने रहने वाले हैं और इनमें कोई कमी नहीं आने वाली है। हालांकि निश्चित तौर से वित्तीय कमजोरियां एक बिंदु पर संकट पैदा करने का ही काम करेंगी और ठेठ भारतीय अंदाज में मूलभूत नीतिगत कार्रवाई करने का दबाव बढ़ेगा।

चाहें ढांचागत संरचना, शिक्षा या फिर औद्यागिक क्षमता में बढ़ोतरी की बात हो अर्थव्यवस्था में गंभीर निवेश जारी है और इसके परिणाम आने अभी बाकी हैं। भारतीय कंपनियों की वैश्विक प्रासंगिकता और हिस्सेदारी में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। एक साल के दौरान विकास दर में कमी से भी अर्थव्यवस्था को राहत की सांस मिलेगी और पिछले साल वर्षो की तेज विकास दर के बाद कारपोरेट्स को भी थोडा आराम मिलेगा।

इसके अलावा बाजार के इस स्तर पर मूल्यांकन में कुछ खामी भी नजर नहीं आती है। हम शायद मार्च 2009 की आय के मुकाबले 15 गुना अधिक पर कारोबार कर रहे हैं, 15 प्रतिशत की आय दर और 15 से 20 प्रतिशत की दीर्घावधि आय हासिल करने का रास्ता मुश्किल नहीं है। दीर्घावधि बॉन्ड के प्रतिफल में 12.5 से 13.5 गुनी तक गिरावट आ सकती है लेकिन इसके बाद और गिरावट की उम्मीद नहीं है। इसका अर्थ है कि 6 से 9 महीने के बाद बाजार में आमदनी बढ़ेगी।

इसके लिए भारत में पहले ही कदम उठाया जा चुका है। यह समय इस बात के लिए सवाल करने का नहीं है कि मौजूदा रुझान के आधार पर क्या भारत 7.5 से 8  प्रतिशत तक की विकास दर हासिल कर सकता है या क्या भारतीय कंपनियों की आय 15 से 20 प्रतिशत की दर से बढ़ सकती है। मुझे लगता है कि दोनों सवालों का जवाब हां में है और संभावनाएं शानदार हैं।

वर्तमान सरकार की निष्क्रियता का यह अर्थ नहीं है कि हमेशा एक ऐसे राजनीतिक गतिरोध की स्थिति बनी रहेगी जहां कोई भी कड़ा आर्थिक फैसला नहीं किया जा सकता है। भारत के विकास की कहानी अभी भी आकर्षक है। जनवरी 2008 में गिरावट से पहले यह अपनी बेहतरीन स्थिति में थी, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। पिछले पांच वर्षो के दौरान 8.5 प्रतिशत की जीडीपी विकास दर यूं ही नहीं मिल गई। तेज विकास दर के बाद अब हमें थोड़ा आराम मिला है।

भारत अब दस खरब डालर वाली अर्थव्यवस्था है और वैश्विक मंच पर निवेशकों और कारपोरेट जगत के सामने दृढ़ता के साथ खड़ा है और अब भारत की चमक फीकी पड़ने वाली नहीं है। इस बात का बिल्कुल भी अंदेशा नहीं है कि हम निवेशकों की नजरों से दूर हो जाएंगे जैसा कि 1994 से 2003 के दशक में देखने को मिला था।

First Published : June 11, 2008 | 11:27 PM IST