बहुत सारे लोगों के लिए सुहेल सेठ के बहुत सारे रूप हैं। इतने रूप कि आउटलुक पत्रिका ने एकबार बेहद हैरानी के साथ कहा था कि आखिर कितने सुहेल सेठ हैं?
पिछले हफ्ते काउंसिलेज के मैनेजिंग पार्टनर सुहेल सेठ भविष्यवक्ता के तौर पर नजर आए। जब वर्ष 2006 में सेठ एक्वेस रेड सेल एडवरटाइजिंग के सीईओ थे, उन्होंने इस लेखक को बताया था कि ब्रांड सचिन अब उतना खास नहीं रहा और न ही इसमें कोई खास ऊर्जा या उत्साह वाली बात है।
पिछले हफ्ते ही पेप्सी ने इस मशहूर क्रिकेटर को ब्रांड एंबेसडर न बनाए रखने का फैसला कर लिया और उनके अनुबंध को जारी नहीं किया। पेप्सी ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है। उसने पत्रकारों से कहा- नो कमेंट्स। खैर, चाहे जो भी हो कई लोगों का मानना है कि बेवरेज से लेकर स्नैक फूड तैयार करने वाली जानी मानी कंपनी पेप्सी उन कंपनियों की फेहरिस्त में शामिल हो गई है जिन्होंने 35 साल के इस विश्व विख्यात बल्लेबाज से अपना नाता तोड़ लिया है।
इन कंपनियों में फिएट, टीवीएस और एयरटेल जैसी कंपनियां शामिल हैं। हालांकि तेंदुलकर का जादू अब भी कई बड़ी कंपनियों पर बरकरार है मसलन एडीडास, अवीवा, ब्रिटानिया, बूस्ट, कैनन और वीसा अब भी सचिन को अपने विज्ञापनों के लिए पसंद करती हैं।
कीमत बनाम क्रिएटिविटी
सेठ के मुताबिक पेप्सी सही काम नहीं कर रही है। इसकी वजह यह है कि इस कंपनी ने कई सालों से सचिन को अपना ब्रांड पर्सन बनाया था। उनके मुताबिक किसी पर इतना खर्च करने के बाद अचानक से अपना फैसला बदल देना थोड़ी मूर्खता तो जरूर लगती है।
यह सही हो सकता है लेकिन यह भी एक सच है कि पिछले 2 सालों में पेप्सी अपने उत्पाद को नए और ताजातरीन श्रेणी में रखने के लिए और युवाओं में अपनी खास पहचान बनाने के लिए पूरे जोर-शोर से कोशिशें कर रही है। यहां तक की पेप्सी ने अपनी टैगलाइन में भी यंगिस्तान नाम दिया है।
स्पोटर्स मैनेजमेंट कंपनी ग्लोबोस्पोर्ट के वाइस प्रेसीडेंट इंद्रनील दास बलाह का कहना है, ‘पेप्सी ने सचिन से अपना नाता तोड़ने का फैसला लिया है वह पूरी तरह से नए अंदाज और नई क्रिएटिविटी का नया प्रयोग करने की ही एक कोशिश है। इसकी वजह यह है कि अगर आप यंगिस्तान जैसे कॉन्सेप्ट पर काम करते है तो उसमें सचिन और राहुल द्रविड़ जैसे खिलाड़ी बिल्कुल ठीक नहीं बैठते।’ सेठ अपनी सहमति और असहमति जताते हुए कहते हैं, ‘निश्चित तौर पर पेप्सी लगातार पिछले दो सालों में युवाओं के ब्रांड के तौर पर उभरी है।
भारतीय क्रिकेट टीम में भी युवा और उनसे ज्यादा पुराने खिलाड़ियों का ग्रुप है। पेप्सी अपने यूथफुल ब्रांड के लिए किसी युवा को ही लेना पसंद करेगी। हालांकि यह भी एक सच है कि ब्रांड केवल युवाओं के लिए ही नहीं होता है बल्कि किसी ब्रांड की दमदार छवि में युवाओं जैसी ताजगी होनी चाहिए। मेरे लिए तो रामजेठमलानी भी अब तक युवापन वाली उमंग के साथ जीने वाले व्यक्तित्व हैं।’
सेठ के मुताबिक सचिन के विज्ञापनों के साथ भी वही हो रहा है जो मुल्क के सेलिब्रिटी विज्ञापनों के साथ होता है। जिस तरह अमेरिका में कई आधुनिक विचारधाराओं का जन्म हुआ उसी तरह वहां सेलिब्रिटी विज्ञापनों की शुरुआत भी की गई थी। इसकी वजह यह थी कि एक बड़ी जनसंख्या के बीच अपने ब्रांड के लिए खास पहचान देने के लिए जाने-माने चेहरे की जरूरत होती थी। इसकी वजह यह है कि सेलिब्रिटी किसी नए ब्रांड को एक नई पहचान, विश्वसनीयता और उसे यादगार बनाने के लिए जरूरी होते हैं।
निश्चित तौर पर इस नए विचार ने भारतीय विज्ञापनों की दुनिया को भी प्रभावित किया। हालांकि अमेरिका में सेलिब्रिटी के तौर पर पहचाने जाने वाले कई चेहरे विभिन्न क्षेत्रों से आते हैं। भारत में फिल्मी हस्तियां और क्रिकेट खिलाड़ी ही सेलिब्रिटी के तौर पर जाने जाते हैं। इसी वजह से यहां सेलिब्रिटी की कीमतें काफी ज्यादा होती हैं और उनकी डिमांड कम होती जाती है। सचिन के साथ अनुबंध खत्म होने की वजह बढ़ती कीमतें ही रही होंगी।
सेठ कहते हैं, ‘आज भी सचिन एक आइकॉन हैं लेकिन उनकी कीमत बहुत कुछ प्रभावित कर देती है।’ यह आंकना बेहद मुश्किल है कि वह किस तरह आइकॉन हैं लेकिन सचिन के साथ किसी ब्रांड के विज्ञापन के लिए एक साल तक की कीमत लगभग 4 से 5 करोड़ रुपये हो जाती है। दूसरे सेलिब्रिटी से भी ज्यादा कीमत है उनकी और उनकी फीस काफी बढ़ रही है। ट्वेंटी- ट्वेंटी क्रिकेट के दौरान भारतीय टीम के कैप्टन रहे महेन्द्र सिंह धोनी भी सचिन के विकल्प के तौर पर उभरे हैं।
हालांकि यह यकीन के साथ कहा जा सकता है कि विज्ञापनों के लिए धोनी की फीस भी सचिन के मुकाबले ज्यादा ही हो सकती है। मिसाल के तौर पर धोनी को इंडियन प्रीमियर लीग के दौरान 6 हफ्ते के लिए 6 करोड़ रुपये मिले। शायद वह साल भर के विज्ञापनों के लिए नए बेंचमार्क के बारे में सोच सकते हैं।
विज्ञापनों का मायाजाल
सेठ को यह उम्मीद है कि सचिन ने सेलिब्रिटी विज्ञापनों की दुनिया में जिस तरह की साफ सुथरी छवि के लिए मेहनत की है वह एक मानक है। लेकिन एक सर्वे के मुताबिक जैसा सोचा गया था वह उतनी कारगर और सफल नहीं है। हाल ही में मार्केट रिसर्च फर्म आईएमआरबी इंटरनेशनल और आई पैन के एक सर्वे के मुताबिक 51 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का यह मानना है कि जिस विज्ञापन के लिए सेलिब्रिटी विज्ञापन करते हैं उसका इस्तेमाल तो वह नहीं करते हैं।
लोगों की राय ऐसी होती है कि सेलिब्रिटी पैसे के लिए विज्ञापन करते हैं और इंपोर्टेड सामान का इस्तेमाल खुद के लिए करते हैं। सामान को खरीदने के लिए जो सबसे खास वजह होती है वह 78 प्रतिशत लोगों के लिए सामान की क्वालिटी है, 9 प्रतिशत लोगों के लिए कीमत और महज 3 प्रतिशत लोगों के लिए सेलिब्रिटी विज्ञापनों का महत्त्व होता है। अब अगर पेप्सी की ही बात करें तो वह सेलिब्रिटी विज्ञापनों पर काफी निर्भर रही। बाजार के आंकड़ों में भी उसने थम्सअप को पीछे छोड़ा है।
सेठ के मुताबिक ब्रांड विज्ञापनों का क्रेज इसलिए भी बढ़ रहा है क्योंकि लोग कोई रिस्क भी नहीं लेना चाहते हैं और उनका यह भी सोचना है कि काम भी आसानी से ही होना चाहिए। कंपनी के मालिकों और सीईओ की इच्छा भी सेलिब्रिटी के साथ अपनी तस्वीरें खिंचवाने में होती है।
उपभोक्ता हमेशा चीजों को अपने फायदे के लिहाज से ही खरीदता है। अगर किसी को टायर लेना है तो वह यह सोचकर टायर कभी नहीं खरीदेगा कि उस टायर के लिए सचिन का विज्ञापन है। सेलिब्रिटी के जरिए लोगों के मन में किसी खास उत्पाद की याद बनी रहती है पर ब्रांड मार्केटरों को अपने उत्पाद के लिए और भी कुछ करने की जरूरत है।
ब्रांडों की बादशाहत
आउट इन
पेप्सी कैनन
फिएट बूस्ट
टीवीएस एडीडास
एयरटेल अवीवा
वीसा
ब्रिटानिया